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गुरुवार, 6 मई 2010
अपना राहुल गांधी खोजें
गिरोह का मुखिया बंदूक दागता है ठांय-ठांय, लेकिन गोली नहीं चलती। बैंक मैनेजर मुखिया से गुजारिश करता है कि वह फिर बंदूक लोड करे। गिरोह का मुखिया बंदूक लोड करता है और फिर से फायर करता है। लेकिन इस बार मैनेजर पर नहीं, खुद पर। गोली से वह जख्मी हो जाता है। दर्द से कराहता हुआ वह साथियों से मदद की गुहार करता है। लेकिन यह क्या, उसके साथी तो पहले ही बैंक मैनेजर के गले से लिपटे हुए हैं।
नहीं, यह किसी कॉमेडी फिल्म का हास्य दृश्य नहीं है। संसद में भाजपा के कटौती प्रस्ताव के दौरान कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। आखिर में हुआ यही कि मुसीबत उलटे भाजपा के ही गले आ पड़ी। भाजपा पहले भी कई बार ऐसा कर चुकी है। उसके कई मजाक अब इतने मजेदार नहीं होते। लेकिन जिस तरह हम मुश्किल में पड़े लोगों का मजाक बनाना पसंद नहीं करेंगे, उसी तरह हमें भाजपा को भी अकेला छोड़ देना चाहिए। भाजपा साधारण सी किताबों के कुछ साधारण से अंशों के आधार पर ही अपने वरिष्ठ-से-वरिष्ठ नेताओं को निष्कासित कर देने वाली पार्टी है।
उनका लगभग हर जाना-माना नेता प्रधानमंत्री पद का दावेदार है। उनके नेता अपनी ही रैलियों में गश खाकर गिर जाते हैं और उनके सहयोगी दल ‘भूलवश’ उन्हीं के खिलाफ वोट डाल देते हैं। साथ ही किसी को नहीं पता कि उनकी राजनीति हिंदूवादी है या हिंदुत्ववादी, सांप्रदायिक है, सांप्रदायिकता विरोधी है या मुस्लिम विरोधी है। एकमात्र चीज जो साफ है, वह यही है कि वे खुद के ही खिलाफ हैं।
लेकिन अगर इस मजाक को दरकिनार कर दें तो हम तो यही चाहेंगे कि भाजपा कुछ बेहतर करे। इसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला यह कि नई वैश्विक दुनिया में भाजपा के दक्षिणपंथी और व्यापार की पक्षधर उदारवादी नीतियों की राष्ट्र को चलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। दुर्भाग्यवश भाजपा की आर्थिक नीतियों पर लगभग कभी बात ही नहीं की गई है। उनके बारे में बनाई जाने वाली लगभग सभी धारणाओं पर भगवा रंग छाया रहता है।
दूसरे यह कि भाजपा अपनी विचारधारा में अधिक स्पष्टवादी और कम पाखंडी है। भले ही अभी वह भ्रम की स्थिति में हो। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि हमारे लोकतंत्र की बेहतरी के लिए भाजपा का मजबूत होना बेहद जरूरी है। हमें दो सशक्त राजनीतिक पार्टियों की आवश्यकता है, क्योंकि एक पार्टी के वर्चस्व की स्थिति में बेहतर इरादों के बावजूद एकाधिकार की प्रवृत्ति पनप सकती है। भारत इस तरह की स्थिति से दो-चार हो चुका है। इन्हीं कारणों के चलते हम आशा करते हैं कि भाजपा खुद को संगठित कर सकेगी।
हालांकि राजनीति में मेरी विशेषज्ञता नहीं है, फिर भी कुछ सुझाव दे सकता हूं। ये सुझाव भाजपा के बारे में युवाओं की धारणाओं पर आधारित हैं। मैं यह साफ कर दूं कि मैं किसी विशेष राजनीतिक दल का समर्थन नहीं कर रहा हूं। मेरी मंशा यही है कि दोनों दल मजबूत स्थिति में हों। यह देश के लिए ही अच्छा होगा। अगले कटौती प्रस्ताव के बारे में सोचने से पहले भाजपा को इन छह बिंदुओं पर विचार कर लेना चाहिए।
अपनी नीतियां स्पष्ट करें
यदि कोई युवा भाजपा से पूछे कि वह किन नीतियों का प्रतिनिधित्व करती है और उसमें और कांग्रेस में क्या अंतर है और वह कांग्रेस से किस तरह बेहतर है तो ऐसे में उसका दो-टूक जवाब क्या होगा? जवाब स्पष्ट और सुनिश्चित होना चाहिए, जो कि अभी नहीं है। अंदरूनी बातचीत से इसे स्पष्ट किया जा सकता है। यहां यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि युवाओं का सबसे ज्यादा सरोकार विकास से है। इसलिए ‘हम जिन्ना की किताबों पर प्रतिबंध लगाएंगे’ या ‘हम हिंदू इतिहास के समर्थक हैं’ जैसी पुरातनपंथी बातों से काम नहीं चलेगा। न ही कोई पार्टी ‘दूसरों’ के प्रति घृणा की जमीन पर चल सकती है। अतीत नहीं, आने वाले कल की बात करें। आप नेता हैं, इतिहास के प्राध्यापक या उपदेशक नहीं।
अहंकार त्यागें
भाजपा के कई नेताओं की पहुंच श्रेष्ठ हिंदू गुरुओं तक है। इसके बावजूद यह हैरानी की बात है कि वे अहंकार के परित्याग का दर्शन नहीं समझ सके। एक दर्जन नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी जताना तो गीता के उपदेशों के अनुरूप नहीं है। भाजपा की अंदरूनी लड़ाइयां किसी से छिपी नहीं हैं, लेकिन अब उसे एकजुट होना ही पड़ेगा।
योग्य नेता की तलाश करें
एकजुट होकर काम करने के बावजूद किसी-न-किसी नेता की दरकार तो होगी ही। पार्टी में सिरे से मूल्यांकन करें कि कौन यह जिम्मेदारी संभाल सकता है। नेता का मूल्यांकन तीन तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए- जनाधार, मीडिया में व्यक्ति का सम्मान और उसकी बुनियादी योग्यताएं। अपने सभी नेताओं का मूल्यांकन इन मानदंडों पर करें और आपको उत्तर मिल जाएगा।
अपने राहुल गांधी को खोज निकालें
राहुल गांधी के प्रशंसक ही नहीं, बल्कि विरोधी भी कभी उनके बारे में कोई नकारात्मक बात नहीं कहते। वे संतुलित हैं, मेहनती हैं और अपनी ताकत का बिल्कुल रौब नहीं जमाते। भाजपा को खुद से यह पूछना चाहिए कि उनका राहुल गांधी कहां है। सीधी सी बात है, यदि उनके पास राहुल गांधी जैसा कोई नहीं है तो वे कामयाब नहीं हो सकेंगे।
काम करें
बहुत कम राज्यों में अब भी भाजपा की सरकार है। कुछ जगहों पर जरूर अच्छा काम किया गया है, लेकिन कुल मिलाकर विकास के क्षेत्र में उनकी उपलब्धि कुछ खास नहीं है। खूब मेहनत से अच्छा काम करके दिखाएं, वोट अपने आप मिलने लगेंगे।
सहयोगी दलों पर निर्भर न रहें
भारत में सहयोगी दलों की मदद के बिना सरकार बनाना अब तकरीबन नामुमकिन हो चला है। लेकिन बेहतर स्थिति वह होगी, जब आप अपने सहयोगी दलों से ज्यादा मजबूत हों। सच्चाई तो यह है कि अगर आप ताकतवर हैं तो सहयोगी दल खुद-ब-खुद चले आएंगे।
जाहिर है, यह सब रातोंरात नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि इन नीतियों का लगातार पालन किया जाता रहे तो दूरगामी नतीजे हासिल होंगे। तब तक भाजपा के लिए यही बेहतर होगा कि वह कांग्रेस की सराहना करे और हर संभव मौके पर कटौती प्रस्ताव लाने की बजाय उससे कुछ सीखने की कोशिश करे।
और अगली बार किसी बैंक डकैती की योजना बनाने से पहले बंदूक का इस्तेमाल करना सीखें, उसे पहले से ही लोड करके रखें और कुछ बेहतर साथियों का जुगाड़ करें। फिर भी सबसे अच्छा तो यही है कि बैंक न लूटें। सिर्फ कड़ी मेहनत करें और पुराने जाने-पहचाने तरीकों से ही कामयाबी हासिल करें।
शुक्रवार, 28 अगस्त 2009
संघ का संकट और पटेल-नेहरू से सबक
इतिहास इंसानों से बनता है लेकिन उसमें इंसानों की तरह अहं नहीं होता। ये सबक इतिहास ही देता है इसलिए इतिहास सत्य की खोज के साथ-साथ बदलता रहता है।
इतिहास में अजीब तरह का लचीलापन होता है जो अमूमन वैचारिक पार्टियों और जिद्दी इंसानो में नहीं दिखाई देता है। इतिहास चिरंतन अपनी गति से चलता रहता है और समयानुसार अपने में बदलाव भी करता है बिना अहं बीच में लाए। और इतिहास को अगर ध्यान से देखें तो उसमें एक ध्रुव पर वल्लभभाई पटेल दिखते हैं तो दूसरे पर जवाहर लाल नेहरू।
....पटेल बीमार हैं और नेहरू उनको देखने गए हैं। पटेल नेहरू से कहते है कि 'तुम मुझपर विश्वास नहीं करते।' नेहरू पलट के कहते हैं कि 'मेरा तो खुद पर से ही भरोसा उठ गया है'... नेहरू और पटेल की ये बात भारतीय इतिहास का वह बिंदु है जो इतिहास को बना भी रहा था और इतिहास को बिगाड़ भी सकता था। दोनों नेताओं के बीच भयानक मतभेद थे और दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी भी थे लेकिन अपने मतभेदों को इस हद तक नहीं ले गए कि टूट का संकट पैदा हो जाए।
बीजेपी और संघ परिवार के मौजूदा विवाद को इतिहास की नजर से देखने और समझने के लिए इतिहास के इस टुकड़े को समझना बेहद आवश्यक है। क्योंकि जिन्ना विवाद हो या फिर संघ परिवार की गुटबाजी बेहद खतरनाक आयाम लेती जा रही है जो कांग्रेस के बरक्स एक वैकल्पिक सत्ता की अकाल मौत का कारण हो सकती है जो देश के लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा।
इस विवाद ने कई चीजें साफ कर दी हैं। एक, संघ परिवार एक लंबे संकट से गुजर रहा है। चूंकि बीजेपी उसका सबसे बड़ा चेहरा है इसलिए बीजेपी पर इस संकट की सबसे बड़ी छाप दिखाई दे रही है। दूसरे, संघ परिवार का ये संकट पटेल नेहरू की तरह वैचारिक ज्यादा है। बीजेपी में दो तरह की धारायें एक दूसरे से टकरा रही हैं। एक वो धारा जो मान रही है कि बीजेपी लगातार दो चुनाव हारी क्योंकि वो अपने मूल वैचारिक चरित्र से भटकी यानी उसने उग्र हिंदूत्ववाद से समझौता किया। और दूसरी वो धारा है जो ये मानती है कि संघ परिवार को सर्वस्वीकार्य बनने के लिये जरूरी है कि वो अपने में बदलाव करे और उग्र हिंदूत्ववाद में लचीलापन लाए और अल्पसंख्यक तबके को अपना बनाने की कोशिश करे।
तीसरा, ये संकट इस बात का भी प्रतीक है कि संघ में दो धाराओं के साथ-साथ दो पीढ़ियों का भी टकराव है। नई पीढ़ी अपने हिसाब से संघ को चलाना चाहती है लेकिन पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को वो जगह नही दे रही है जो उसे मिलनी चाहिए। साफ शब्दो में कहें तो संघ प्रमुख मोहन भागवत और लाल कृष्ण आडवाणी के बीच सत्ता संघर्ष है। दिलचस्प बात ये है कि आडवाणी से उम्र में कम होने के बावजूद भागवत संघ और बीजेपी को उग्र हिंदूत्ववाद की तरफ ले जाना चाहते है और पुरानी पीढ़ी के आडवाणी बदलते समाज और लोकतंत्र की जरूरत के मुताबिक विचारधारा के स्तर पर बदलाव की वकालत कर रहे हैं।
चौथे, संघ परिवार सामाजिक और राजनीतिक संगठन का फर्क भी नहीं समझ पा रही है, वो बीजेपी को एक सामाजिक संगठन की तरह चलाना चाहती है जो संभव नहीं है। सामाजिक संगठन में संगठनात्मक मजबूती तो होती है लेकिन राजनीतिक संगठन की तरह सर्वशक्तिमान होने की संभावना नहीं होती है। आरएसएस एक सामाजिक संगठन है, उसकी ताकत अपार है, उसके बिना बीजेपी काफी कमजोर हो जाएगी लेकिन बीजेपी अगर सत्ता में आ जाए तो उसका नेता देश का प्रधानमंत्री होगा और एक प्रधानमंत्री कितना भी कमजोर होगा आरएसएस प्रमुख की ताकत उसका मुकाबला नहीं कर पाएगी।
ये बात जब वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो सुदर्शन को समझ नहीं आई और उनको लगता था कि वो नागपुर से बीजेपी और वाजपेयी को हांक सकते है। शुरू में जसवंत सिंह को वित्त मंत्री न बनने देकर लगा वो कामयाब होंगे लेकिन जब प्रधानमंत्री ने अपनी ताकत दिखाय़ी तो संघ परिवार के पास वाजपेयी के सामने नतमस्तक होने के अलावा कोई चारा नही था।
सुदर्शन और अशोक सिंघल लाख कहते रहे कि तब प्रधानमंत्री कार्यालय में अमेरिकी एजेंट है लेकिन चीखने के सिवाय कुछ कर नहीं पाए। आरएसएस को ये बात समझनी चाहिए लेकिन वो उस भारतीय परंपरा में जवाब तलाशते हैं जिसमें चक्रवर्ती सम्राट किसी संत मुनि के आने के बाद अपने सिंहासन से उठ कर उनका स्वागत करता है।
संघ परिवार ये मानता है कि नैतिक सत्ता के आगे राजनीतिक सत्ता को झुकना चाहिए लेकिन वैदिक काल और कलयुग का अंतर न समझने की वजह से ही भागवत अब आडवाणी को अपने सामने झुकाना चाहते हैं जो संभव नहीं। पांच, इस नासमझी की वजह से संघ परिवार ने जिद ठान ली है और वो पार्टी के अंदर हार के बाद होने वाले वैचारिक मंथन को भी बगावत की नजर से देख रहा है।
विचारधारा स्वाभावत: तानाशाही होती है चाहे वो साम्यवाद हो या फिर हिंदूवाद या फिर हिटलर का फांसीवाद या अल कायदा का रैडिकल इस्लाम। संघ को ये समझना होगा कि देश बदला है और आम जनमानस में जबर्दस्त परिवर्तन आया है, वो विचारों की स्वतंत्रता में अपने और अपने समाज की अस्मिता खोजती है और ऐसे में विचार पर पाबंदी लग जाये वो कतई नहीं चाहेगी। संघ परिवार को अपने आराध्य इतिहास देव वल्लभभाई पटेल से सबक लेना चाहिए और शायद नेहरू से भी जिनको 'डी - कंस्ट्रक्ट' करने का कोई भी मौका वो गंवाना नहीं चाहती।
सबको पता है कि नेहरू समाजवाद से प्रभावित थे तो पटेल दक्षिणपंथ से या यों कहें हिंदूवाद से। चाहे वो कश्मीर का मुद्दा हो या फिर चीन का या फिर अल्पसंख्यक नीति, दोनों नेता अलग-अलग ध्रुव पर खड़े थे। दोनों नेताओं के अपने अपने समर्थक थे जो दोनों को अपने-अपने हिसाब से प्रभावित करने के उधेड़बुन में लगे रहते थे। रफी अहमद किदवई ने तो एक बार पटेल और उनकी दक्षिणपंथी नीतियों के चलते नेहरू को ये सुझाव भी दिया था कि उन्हें इन दकियानूसी लोगों का साथ छोड़ समाजवादी पार्टी बनानी चाहिए थी।
हिंदूस्तान टाइम्स के संपादक 'दुर्गा दास' अपनी किताव 'इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर' में लिखते हैं कि रफी अहमद को पूरा भरोसा था कि अगर नेहरू नई पार्टी बनाएंगे तो वो पहले आम चुनाव में आसानी से बहुमत ले आएंगे और समाजवादी नीतियों को लागू करने मे कोई दिक्कत नहीं आएगी। नेहरू ने तब जवाब दिया था कि 'अभी जरूरत आजादी को मजबूत करने की है' और ये जानते थे कि वो और पटेल ये काम मिलकर कर सकते है अकेले नहीं।
ऐसा नहीं था कि दोनों में तकरार नहीं होती थी। कई बार दोनों नेताओं ने इस्तीफे तक देने की धमकी दे डाली थी। नेहरू की इच्छा के विरुद्ध पुरुषोत्तम दास टंडन जब कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए तो नेहरू ने पार्टी और सरकार दोनों से इस्तीफा देने का मन बना लिया था लेकिन ऐसा हुआ नहीं, कुछ नेहरू के इतिहासबोध की वजह से और कुछ टंडन के बड़प्पन के कारण।
एक बार कैबिनेट की बैठक में नेहरू और पटेल के बीच कहासुनी हो गई, नेहरू ने मेज पर मुक्का मारते हुए कहा 'पटेल तुम्हारे जो मन में आये करो'। पटेल बहुत नाराज हो गए, उन्होंने दुर्गादास से कहा 'नेहरू पागल हो गये है और अब मैं उनको बर्दास्त करने को तैयार नहीं हूं'।
दुर्गादास के मुताबिक पटेल ने उनसे कहा कि वो गांधीजी के पास जा रहे हैं और उनसे कहेंगे कि वो इस्तीफा दे देंगे। दुर्गादास ने कहा कि 'गांधी जी उनको कभी भी छो़ड़ने नहीं देगे क्योंकि गांधी जी मानते हैं कि पटेल और नेहरू दो बैलों की जोड़ी हैं जो सरकार को खींच रहे हैं'। तब झल्ला कर पटेल बोले 'बुड्ढा सठिया गया है, वो समझते हैं कि माउंटबेटेन हमारे और नेहरू के बीच बीचबचाव कर सकते हैं'।
पटेल ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले एक जगह कहा भी है कि 'मैं नेहरू से बेहद स्नेह करता था लेकिन नेहरू ने कभी भी मुझे इस लायक नहीं समझा'। ये झगड़ा गांधी के समय भी था और उनके बाद भी बना रहा लेकिन अगर इस झगड़े में अहं का टकराव होता और अपने दरबारियों की बात में आकर दोनों अपने रास्ते अलग कर लेते तो शायद भारत का इतिहास कुछ और होता और या शायद हम आज लोकतंत्र भी नहीं होते।
ये वो वक्त था जब तमाम मतभेदों के बीच संविधान बन रहा था, दंगे हो रहे थे, विभाजन का दर्द झेलते लाखों करोड़ो लोगों का खयाल रखना था, पांच सौ से ज्यादा छोटे-छोटे राजाओं को देश में मिलाना था, साम्यवादियों का तेलंगाना आंदोलन दबाना था, कश्मीर पर पाकिस्तान का हमला निपटना था और सबसे बड़ी बात, आजादी की नींव को मजबूत करना था।
दोनों ने अपने अहं को अहमियत नहीं दी इतिहास में अपनी भूमिका को पहचाना और अपने उसूलों से समझौता किए बिना दो बैलों की जोड़ी बने रहे। शायद आज आडवाणी और भागवत को इसी इतिहास दृष्टि से काम लेना होगा नहीं तो संघ परिवार तो रहेगा लेकिन इतिहास सम्मान की नजर से इन्हें देखेगा इसमे संदेह है। क्योंकि ये सही है कि इतिहास में अहं नहीं होता लेकिन वो भूलता भी नहीं है और खासतौर से उनको जो इतिहास को नहीं समझते और न ही उससे सबक लेते हैं।
रविवार, 5 जुलाई 2009
महिलाओं की पोशाक संहिता
पिछले दिनों कानपुर के महिला महाविद्यालयों में लड़कियों को जीन्स पहनकर पढ़ने आने पर रोक लगाने की बात पर बवाल उठ खड़ा हुआ। सरकार को बीच में आना पड़ा। "ड्रेस कोड लागू नहीं किया जाएगा" का आदेश हुआ। सरकार की सराहना हुई है। समाज में बहुत लोग ड्रेस कोड लगाने के पक्षधर थे, तो बहुत लोग विरोधी।मैं भी इस बात से सहमत हूं कि महाविद्यालयों में पढ़ने जा रही लड़कियों पर "ड्रेस कोड" नहीं लगना चाहिए। पर सवाल तो यह उठता है कि आखिर प्राचार्यो के मन में ड्रेस कोड लगाने की बात उठी क्यों हमारी बच्चियां कैसे कपड़े पहनें, यह निश्चित करना सरकार या समाज (विद्यालय- महाविद्यालयों) का काम नहीं है, परन्तु कपड़ों पर ध्यान तो देना ही है।
बेटियां-बहुएं वही ड्रेस पहनती हैं जो बाजार में बिकते हैं या फैशन शो में दिखाए जाते हैं। इसलिए यह तो मानना होगा कि उनकी अपनी रूचि का सवाल नहीं है। फैशन शो वाले तय करते हैं कि हमारी बेटियां अर्द्धनग्न दिखें, बेटों का पूरा शरीर ढका हो।
चलिए। मान लेते हैं कि शरीर का प्रदर्शन भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अन्दर आता है, पर कितनी स्वतन्त्रता कैसी स्वतन्त्रता क्या एक सामाजिक प्राणी होते हुए हम इतने स्वतन्त्र हैं कि जो मन में आए, वैसा करें जहां मन में आए, वहां जाएं जिसे मन में आए, उसे गोली मार दें नहीं न! फिर वस्त्र के मामले में इतनी स्वच्छंदता क्यों
जल-थल-नभ पर पांव रखने वाली बेटी-बहुओं से यह अपेक्षा करना भूल ही नहीं, अपराध होगा कि वे साड़ी में लिपटी रहें। परन्तु जब भड़काऊ भाषण पर प्रतिबंध लगता है तो भड़काऊ ड्रेस पर क्यों नहीं यह नहीं कहती कि बेटियां जीन्स पहने ही नहीं। हमारे जमाने में जीन्स थी ही नहीं तो हम पहनती कैसे
अर्द्धनग्नता बर्दाश्त नहीं होनी चाहिए। बेटियों को एहसास कराने भर की बात है। कहां कैसा वस्त्र पहनकर जाएं, इतनी सज्ञानता होनी चाहिए। मां-बाप जिस वेश में स्वयं अपनी बेटियों को पूरी नजर नहीं देख सकें, कम से कम वैसे वस्त्र पहनकर तो बाहर न निकलें बेटियां।
यह नसीहत नहीं है। स्वयं एहसास करने की जरू रत है। हर माता-पिता की इच्छा होती है कि उनकी बेटियां सुन्दर दिखें। अर्द्धनग्नता सौंदर्य बढ़ा ही नहीं सकती। फिर तो वस्त्र की जरूरत ही नहीं होती। इन सामाजिक समस्याओं को भी कुछ लोग पारम्परिकता और आधुनिकता के विवाद में फंसा ले जाते हैं। नाहक समाज दो खेमों में बंट जाता है। यह वाद-विवाद का विषय नहीं है। बात इतनी-सी है कि शिक्षालयों में युवतियां शिक्षा और संस्कार ग्रहण करने जाती हैं। वहां शालीन वस्त्र, संयमित व्यवहार और हावभाव होना चाहिए। यह अपेक्षा मात्र लड़कियों से नहीं लड़कों से भी है। अंतर्मन से आधुनिक होना चाहिए। आधुनिकता की प्रतिद्वंद्विता से बचना चाहिए। हमारे वस्त्र हमें आधुनिक नहीं बनाते।
रविवार, 21 जून 2009
स्वीकार्य नहीं गुजकोका
दरअसल केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच पत्र व्यवहार का संवेदनशील ब्यौरा उजागर नहीं करने की परम्परा है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद "गुजकोका" को वापस भेजने के निर्णय की संवाददाताओं को जानकारी देते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम् ने इस पर तीन आपत्तियां बताईं। इससे मोदी के इस दावे की पोल खुल गई कि संशोधित "गुजकोका" भी कर्नाटक और महाराष्ट्र के आतंक-विरोधी कानूनों की तरह है। हकीकत यह है कि गुजरात सरकार "गुजकोका" के जरिये ऎसे अपरिमित अधिकार चाहती है, जो मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली कोई लोकतांत्रिक सरकार स्वीकार नहीं कर सकती।
गुजकोका के प्रावधानों पर केन्द्र की पहली आपत्ति यह है कि इसमें पुलिस अधिकारी के समक्ष इकबालिया बयान को अदालत में स्वीकार्य बनाया गया है। सभी जानते हैं कि पुलिस मामूली चोरी को भी कबूल करवाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाती है। यही नहीं गुजकोका में एक प्रावधान यह भी किया गया है कि यदि लोक अभियोजक विरोध करे तो अदालत जमानत मंजूर नहीं कर सकती। यह तो हद हो गई! फिर अदालत की जरू रत ही क्या है मुल्जिम को लोक अभियोजक के समक्ष पेश कर ही जमानत पर फैसला करवा लिया जाए। केन्द्र सरकार को गुजकोका की धारा 20 (2) पर भी आपत्ति है। इस धारा में प्रावधान संभवत: इतना "संवेदनशील" है कि चिदम्बरम् को चुप्पी ही साधनी पडी। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि ये तीन संशोधन गुजरात सरकार कर दे, तो केन्द्रीय मंत्रिमंडल उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज सकता है। क्या मोदी अब भी यही दावा करेंगे कि केन्द्र सरकार "भेदभाव" कर रही है भले ही गुंडे, डाकू, उग्रवादी, फिरकापरस्त और आतंककारी मानवाधिकारों की इज्जत नहीं करते, पर लोकतांत्रिक समाज तो उन्हें इनसे कतई वंचित नहीं कर सकता। गुजरात सरकार को भी यह बात माननी ही पडेगी
मंगलवार, 19 मई 2009
भटकती भाजपा

इस बार लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की वैसी ही स्थिति उभरकर सामने आई, जैसी कि पिछले लोकसभा चुनाव में आई थी। शायनिंग इण्डिया का नारा अंधेरे में दबकर रह गया था। अपनी इतनी बड़ी हार से भाजपा में बौखलाहट का बड़ा वातावरण भी दिखाई दिया। इस बार भी दावे तो आसमान से नीचे ही नहीं उतरे, किन्तु भाजपा चारों खाने चित्त हो गई। लालजी ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि यदि मैं पी.एम. नहीं बना तो घर लौट जाऊंगा।
न पी.एम. ही बने, न घर ही लौटे। भाजपा की यह सबसे बड़ी भूल साबित हुई कि उनको इतना पहले से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस सम्मान को पचा सकना उनके लिए असंभव हो गया। इस पूरे काल में उनके तेवर भी प्रधानमंत्री जैसे ही रहे। अन्तत: जनता ने ही उनके नेतृत्व को नकार दिया। चुनाव प्रचार के दौरान ही एक और समझदार नेता ने अपने पिटारे से मोदी का नाम छोड़ दिया। इसका एक अर्थ यह था भाजपा के एक धड़े को भी आडवाणी का नेतृत्व स्वीकार नहीं है और वह भी ऎन चुनाव के पहले। भाजपा का इससे बड़ा नुकसान तो कांग्रेस ने भी नहीं किया। इस घोषणा से नरेन्द्र मोदी भी फुफकारने लग गए। सभी नेताओं की वाणी से विष उगला जा रहा था। इसका परिणाम भी वही होना था। भाजपा के सहयोगी दलों ने भी मोदी को नकार दिया।
दिल्ली के गढ़ में भाजपा का एक संतरी भी नहीं बचा। उत्तराखण्ड में भी भाजपा को बैरंग लौटना पड़ा। राजस्थान में अकाल पड़ गया। मात्र चार सीटों पर संतोष करना पड़ा। चुनाव प्रचार में यहां भी बयानबाजी का बड़ा दौर चला था। गुलाब चन्द कटारिया की रथ यात्रा आगे बढ़ती गई और पीछे-पीछे भाजपा की चादर सिमटती चली गई। पहले ही दिन से उदयपुर की पांच सीटें कांग्रेस को जाती दिखाई दे रही थीं, राजसमन्द को छोड़कर। भाजपा के लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। राजस्थान में हम इन चुनावों के आंकड़ों को पिछले चुनाव के आंकड़ों से मिलाएं तो पता चल जाएगा कि भाजपा का मतदाता उदासीन होता जा रहा है। सन् 2003 में विधानसभा और सन् 2008 के विधानसभा में कांग्रेस के पक्ष का मतदान मात्र 1 प्रतिशत बढ़ा था, जबकि भाजपा के पक्ष में लगभग 5 प्रतिशत मतदाता घटे थे। सन् 2004 के और सन् 2009 के लोकसभा चुनाव कहानी को और आगे ले गए। कांग्रेस के पक्ष में 5.75 प्रतिशत वोट बढ़े, किन्तु भाजपा के पक्ष में टूट 12.44 प्रतिशत की हुई। शेष मतदाता वोट डालने नहीं आए।
कांग्रेस के हारे हुए विधायक सी.पी. जोशी और लालचन्द कटारिया सांसद चुने गए, जबकि भाजपा के जीते हुए विधायक घनश्याम तिवाड़ी, किरण माहेश्वरी और राव राजेन्द्र सिंह चुनाव हार गए। एक बात और भी है कि गांवों में रोजगार गारण्टी योजना का प्रभाव भी दिखाई पड़ा। भाजपा की कई योजनाएं लागू ही नहीं हो पाई।
किसी की नहीं मानना भी भाजपा के लिए शान की बात हो गई है। चाहे राजनाथ सिंह हो, चाहे आडवाणी, सुषमा स्वराज या वसुन्धरा राजे। इनके लिए तो सही उतना ही है जो इनको सही लगता है। इस पर भी जातिवाद का भूत भीतर इतना उतर गया है कि लोगों को राष्ट्रवाद छोटा सा जान पड़ता है। लोग अपनी-अपनी जाति के बाहर नेतृत्व देने को ही तैयार नहीं है। प्रचार के दौरान भाजपा की छवि गिरती चली गई और किसी के भी कान खड़े नहीं हुए। भ्रष्टाचार और अपराधियों को शरण देने में भी किसी पार्टी से पीछे नहीं रही। आज भी भाजपा अपनी साम्प्रदायिक छवि से उबर नहीं पाई है। नई पीढ़ी का मतदाता शान्ति चाहता है।
राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या हो, इस पर वह सोचे। आज भाजपा से न कार्यकर्ता संतुष्ट है, न ही देश। भाजपा ही देश की दूसरी बड़ी राजनीतिक पार्टी भी है। हर बार इसी तरह मार खानी हो तो इसकी मर्जी, किन्तु कुछ करने लायक बनना है तो पार्टी का पुनर्गठन एवं नीतियों का आकलन करना होगा। सभी पुराने चेहरों को सलाहकार का दर्जा देकर पीछे की सीट पर बिठा देना चाहिए। कांग्रेस में भी ऎसे ही लोग "घुण" का कार्य कर रहे हैं। वहां तो नीचे पोल ही पोल है। भाजपा में तो ऎसा नहीं है। केवल अहंकार है।
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि दो बड़े दलों में से एक पटरी से उतर गया है। वरना तीसरे मोर्चे की जरूरत ही देश को नहीं पड़ती। सब जानते हैं कि तीसरा और चौथा मोर्चा किन लोगों का गठबन्धन है और देश को क्या दे सकता है। भाजपा में यदि आवश्यक सुधार नहीं हुआ तो ये लोग ही लोकतंत्र के नायक होंगे।