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बुधवार, 5 अगस्त 2009

सफलता के सात फार्मूले


कोई व्यक्ति ऊंचा काम कैसे पाता है। भाग्य, प्रतिभा या निष्ठा के कारण। जीवन के हर क्षेत्र में ऊंचा काम करने वालों के कुछ गुण और स्वभाव समान होते हैं। इसे कोई भी सीख सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी कंपनी के अध्यक्ष पद तक पहुंच सकता है या ओलिंपिक पदक जीत सकता है। जीवन में सफलता पाने के लिए गारफील्ड ने सूत्र दिए हैं। वे इस प्रकार हैं-

सुनियोजित जीवन : हम प्राय: सुनते हैं कि जीवन में सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है, जो काम के दीवाने होते हैं। ऎसे लोग जो दफ्तर में ज्यादा काम करते हैं, वे अपने आराम का ख्याल नहीं रखते। वे आराम से ज्यादा काम को तवज्ाों देते हैं, ऎसे व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र के शिखर पर पहुंच तो जल्दी जाते हैं, लेकिन टिक नहीं पाते। इसके विपरीत सफल व्यक्ति जी-तोड मेहनत करने को तो तैयार रहते हैं, लेकिन सीमा में उनके लिए काम ही सब कुछ नहीं होता।

काम अपनी रूचि का चुनिए : अपनी रूचि के अनुसार काम चुनना चाहिए। जो पसंद हो वही काम करें। इससे काम में आनंद आता है। इससे सफलता के रास्ते खुलते हैं।

चुनौतीभरे काम की तैयारी : किसी भी कठिन काम को करने के लिए पहले से अभ्यास करना जरूरी है। आमतौर पर हम सिर्फ सपने देखते हैं। हवाई किले बनाते हैं। बैठे-बैठे किले बनाने से सफलता नहीं मिलती। इसलिए सकारात्मक काम करने की जरूरत है।

परिणाम पर ध्यान रखें : अनेक महत्वाकांक्षी तथा परिश्रमी व्यक्ति आदर्श काम करने की भावना से इतने ग्रस्त रहते हैं कि ज्यादा काम नहीं कर पाते। सर्वश्रेष्ठ कार्य वही लोग कर पाते हैं, जो पूर्णत: त्रुटिहीन काम करने के दबाव में नहीं रहते। वे अपनी गलतियों को असफलता नहीं मानते, उनसे अगली बार बेहतर काम करना सीखते हैं।

जोखिम उठाने तैयारी : व्यक्ति के जीवन में नीरसता आए या काम औसत दर्जे का हो तो वे जोखिम उठाने की जगह सुरक्षा को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। ऊंचाई पर जाने वाले लोग जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं। वे इसके लिए पहले से ही मानसिक रूप से तैयार होते हैं।

अपनी सामथ्र्य को कम ने आंकें : ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि उन्हें अपनी सीमाएं मालूम हैं, लेकिन हमें जितना कुछ मालूम होता है वह जानकारी नहीं है। वह मिथ्या विश्वास है। यह हमें सीमाओं में बांधता है। ऊंचे लोग काम करने की कृत्रिम सीमाओं की परवाह नहीं करते। वे अपनी भावनाओं, अपनी कार्यप्रणाली और अपने प्रत्यनों की गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

अपने-आप से करें स्पर्धा : काम करने वाले अपने स्पर्धियों को पीछे करने के बजाय पिछले प्रत्यनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। ऊंचे काम करने वालों की रूचि किसी भी काम को अपनी कसौटी के अनुसार बेहतर ढंग से करने की होती है, इसलिए वे अलग रहने के बजाय मिल-जुलकर काम करते हैं। अपनी प्रतिभा का ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग करते हैं।

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

प्रेम विवाह पर भारी चौधराहट और परंपराएं


आदमी बेशक चांद पर चहलकदमी कर आया है और मंगल पर आशियाना बनाने के बेहद करीब हो, लेकिन हरियाणा के गोत्र विवाद को देखने से नहीं लगता कि दुनिया में कोई ज्यादा बदलाव आया है। पुरानी परंपराएं और चौधराहट इस कदर हावी है कि इंसान की जिंदगी भी उसके सामने गौण होकर रह गई है। पुरानी परंपराओं का निर्वाहन कर रही पंचायतें (खाप) पुलिस-प्रशासन और सरकार तो दूर, अदालत को भी ठेंगे पर रखती हैं। जींद में वेदपाल की हत्या इस बात को साबित करती है कि मूंछ के लिए चौधरी किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनके लिए सदियों से चले आ रहे रीति रिवाज और मान्यता सर्वोपरि हैं। गोत्र विवाद आए दिन होते हैं, लेकिन सरकार इनका निबटारा करने की बजाए खाप के सामने नतमस्तक होती नजर आती है। हो भी क्यों न, जाट जो नाराज हो जाएंगे? खाप का मतलब कई गांवों का एक बड़ा समूह होता है।

हरियाणा में जो खाप शक्तिशाली मानी जाती हैं उनमें मलिक (गठवाला), पूनिया, श्योराण तथा सांगवान शामिल हैं। खाप में जो मामले विचार के लिए लाए जाते हैं उनमें पुरातन परंपराओं को बहाल रखने की कवायद प्रमुख है। खाप इतनी ज्यादा शक्तिशाली होती है कि बड़े से बड़ा राजनीतिक भी उसके फरमान की अनदेखी नहीं कर सकता है। हाल के वर्षो में खाप जिस चीज के लिए ज्यादा चर्चा में आई हैं उनमें गोत्र प्रमुख है। हर खाप ने सम गोत्र में विवाह निषिद्ध घोषित कर रखा है। श्योराण पच्चीसी के प्रधान बिजेंद्र सिंह कहते हैं कि विवाह के समय अपने साथ मां, दादी के गोत्र को बचाना होता है। बिजेंद्र कहते हैं कि परंपराएं सोच समझकर बनाई गई हैं। सामाजिक विकृतियों को रोकने के लिए ही इन्हें बनाया गया है। झगड़ा उस समय शुरू होता है जब आजाद ख्याल युवक-युवती परंपरा के खिलाफ जाकर अपनी दुनिया बसाने की जुगत भिड़ाते हैं।

पुलिस के एक अधिकारी कहते हैं कि गोत्र एक हजार से ज्यादा हंैं लिहाजा इसका ख्याल रखना भी मुश्किल होता है। उनका कहना है कि सब कुछ जानने के बाद भी पुलिस व प्रशासन मूक दर्शक ही बना रह जाता है क्योंकि सरकार कोई भी हो, जाट समुदाय के गुस्से से सभी डरते हैं, यही वजह है कि खाप के आगे कानून व्यवस्था पंगु हो जाती है। प्रेम विवाह पर भारी चौधराहट और परंपराएं

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

आखिर कब तक ?


दस साल पहले हमने कारगिल युद्ध का सामना किया था। देश ने लगभग 527 जवान खोकर इस युद्ध में दुश्मन देश पाकिस्तान को परास्त कर दिया था। लेकिन नक्सलवाद के रूप में हम न जाने कितने कारगिल जैसे युद्ध लड़ चुके हैं और हमें कोई सफलता भी नहीं मिली है। वैसे तो देश में नक्सलवाद की लड़ाई दो दशक से भी पुरानी है, लेकिन पिछले पांच सालों पर नजर डालें तो तीन हजार से अधिक लोग इस लड़ाई की भेंट चढ़ चुके हैं। इतना ही नहीं हजार से अधिक जवान भी शहीद हो चुके हैं। सिर्फ इस साल ही अब तक 6 महीनों में 230 जवान समेत लगभग 485 लोगों की मौत हो चुकी है। देश में नक्सलवाद पर पेश है एक खास रिपोर्ट..

इस साल सबसे अधिक

देश में नक्सल प्रॉब्लम दिन पर दिन विकराल रूप लेती जा रही है। वैसे तो यह प्रॉब्लम शुरू हुई थी सत्तार के दशक में लेकिन दो दशक पहले इसका हिंसक रूप सामने आया। पिछले पांच सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल सबसे अधिक घटनाएं सामने आई हैं। इस साल के 6 महीनों में ही 1130 घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि लास्ट इयर सेम पीरियड में 766 मामले सामने आए थे। इतना ही नहीं इस वर्ष अब तक कुछ 485 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें 230 जवान और 255 आम नागरिक थे।

37000 सोल्जर्स

नक्सलवाद की यह लड़ाई कितनी बड़ी है इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस समय लगभग 37 बटालियन पैरामिलिट्री फोर्स यानी 37000 सोल्जर्स जंग से लड़ने के लिए लगाए गए हैं।

छत्ताीसगढ़ में अधि

वैसे तो देश के लगभग 12 स्टेट नक्सलवाद की इस समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन छत्ताीसगढ़ में प्रॉब्लम सबसे अधिक सीरियस बनी हुई है। पिछले दिनों में यहां एक नक्सली हमले में एसपी समेत 36 लोगों की जान चली गई थी। यहां की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पूरे देश में नक्सलवाद से मुकाबले के लिए लगीं कुछ 37 बटालियन में 17 बटालियन यानी 17 हजार जवान अकेले छत्ताीसगढ़ में लगाए गए हैं। साथ ही देश में कुल होने वाली नक्सली घटनाओं में 82 परसेंट घटनाएं छत्ताीसगढ़, बिहार, झारखंड और उड़ीसा में संयुक्त रूप से होती हैं। इसके साथ ही कुल होने वाली कैजुअल्टीज का 77 परसेंट इन्हीं स्टेट्स में हुई हैं।

इतिहास के झरोखे से

नक्सलाइट्स टर्म वेस्ट बंगाल के एक स्माल विलेज नक्सलवारी से आया है। जहां कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का एक भाग चारू मजूमदार और कानू सांन्याल के नेतृत्व में 1967 में हिंसक हो गया, जिसने सीपीआई लीडरशीप के खिलाफ ही रिवेल्यूशनरी अपोजिशन डेवलप करने की कोशिश की। विद्रोह की शुरुआत 25 मई 1967 में नक्सलबारी विलेज में उस समय हुई जब एक किसान पर भूमि विवाद को लेकर हमला किया गया। मजूमदार चीन के माओ जेडांग से इंस्पायर था और भारतीय किसानों और लोअर क्लास की जमीनों को गिरवी रखने के लिए वह गवर्नमेंट और अपर क्लास को जिम्मेदार ठहराने लगा। इसके बाद नक्सलाइट मूवमेंट का जन्म हुआ। 1967 में नक्सलाइट ने आल इंडिया कोआर्डिनेशन कमेटी आफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरीज संगठित किया जो बाद में सीपीआई (एम) में बंट गया। 1969 में एआईसीसीसीआर ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (मार्सिस्ट-लेनिनिस्ट) को जन्म दिया। प्रेक्टिकली धीरे-धीर सभी नक्सलाइट ग्रुप्स अपने ओरिजिन सीपीआई (एमएल) से पहचाने जाने लगे। 1980 में तीस नक्सलाइट ग्रुप्स 30 हजार कंबाइंड मेंबरशिप के साथ सक्रिय हुआ। भूमि और सामान्तवाद की यह लड़ाई धीरे-धीरे खूनी जंग का रूप लेने लगी। नक्स्लवाड़ी से पूरा वेस्ट बंगाल फिर उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, बिहारी, छत्ताीसगढ़ के साथ देश के लगभग एक दर्जन राज्यों में यह एक समस्या के रूप में सामने आया।

नक्सल का आतंक बढ़ता ही जा रहा है. नक्सली आए दिन अटैक कर रहे हैं. नक्सली अक्सर खाकी वर्दी को अपना निशाना बनाते हैं. वामपंथी नक्सलवाद देश के 630 डिस्ट्रिक्ट में से 180 को अपनी चपेट में ले चुका है। देशभर में इनके करीब 22 हजार कैडर हैं।

झारखंड

पूरा स्टेट माओवाद की चपेट में, लेकिन 24 में से 16 डिस्ट्रिक्ट बुरी तरह पीड़ित हैं. स्टेट में माओवादियों के छह प्रमुख ग्रुप काम कर रहे हैं. तृतीया प्रस्तुति कमेटी, झारखंड प्रस्तुति कमेटी, द पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया, झारखंड जनसंघर्ष मुक्ति मोर्चा, संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा वसीपीआई (एम)।

उड़ीसा

यह स्टेट भी अधिकांश लाल रंग में रंग चुका है, लेकिन कुल 30 डिस्ट्रिक्ट्स में से आंध्र प्रदेश व छत्ताीसगढ़ से सटी सीमा के 17 डिस्ट्रिक्ट माओवाद से भयंकर रुप से ग्रस्त हैं। दक्षिणी उड़ीसा के मलकानगिरि, कोरापुट, रायगढ़, गजपति डिस्ट्रिक्ट्स में इनकी मजबूत उपस्थिति है। आदिवासी बहुल्य कंधमाल में भी अच्छा नेटवर्क है। उड़ीसा के डिस्ट्रिक्ट्स सुंदरगढ़, देवगढ़, संभलपुर बौध और अंगुल में तेजी से फैलाव।

बिहार

इस स्टेट के 38 में से 19 डिस्ट्रिक्ट्स में अच्छा खासा प्रभाव, पहले से इनकी मौजूदगी वाले पटना, गया, औरंगाबाद, भभुआ, रोहतास ओर जहानाबाद के अलावा अब इनका फैलाव उत्तार की तरफ हो रहा है। पश्चिमी चंपारण, पू. चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मघुबनी इनके नए विस्तार क्षेत्र हैं. सहरसा, वेगूसराय, वैशाली और उत्तार प्रदेश से सटे एरियाज में भी इनका प्रभाव है।

छत्ताीसगढ़

30 साल से माओवाद समस्या ने खनिज संपदा से धनी इस स्टेट की हालत को बदतर करने में मेन रोल निभाया है। 10 डिस्ट्रिक्ट्स के 150 पुलिस थाने गंभीर रुप से संवेदनशील. दंतेवाड़ा, कांकेर, बस्तर, बलरामपुर ओर सारगुजा डिस्ट्रिक्ट्स में माओवादियों की जड़े मजबूत।

आंध्र प्रदेश

स्टेट के दंडकारण्य एरिया में इनका खतरा बना हुआ है. विशाखापट्नम, विजयानगरम, खम्माम और पूर्वी गोदावरी डिस्ट्रिक्ट्स में मजबूत नेटवर्क।

महाराष्ट्र

गढ़चिरौली इनका गढ़ है जबकि चंद्रपुर गोडिंया, यवतमाल, भंडारा और नांदेड़ जैसे डिस्ट्रिक्ट नक्सलग्रस्त घोषित। ये सभी जिले आंध्र प्रदेश, छत्ताीसगढ़ और मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित एरियाज से सटे हुए हैं

शनिवार, 23 मई 2009

अरक्षित दलित


शहरों में सामाजिक बदलाव की बयार के बीच गांवों में अब भी दलित समाज मुख्यधारा में से अलग थलग पडा हुआ है। दलितों की सुरक्षा के लिए कई कानून बनाने के बावजूद उन्हें अब भी सामाजिक समानता हासिल नहीं हो पा रही। भीलवाडा जिले में दलित अत्याचार की बढती घटनाओं ने प्रशासन की चिन्ता बढा दी है। दलित समुदाय में अरक्षा के भाव पनपने से गांवों में सामाजिक सौहार्द का माहौल भी बिगडने का खतरा है। जहाजपुर तहसील के ऊंचा गांव में दलित दूल्हे की बिन्दोली पर तेजाब फेंकने से दूल्हे सहित छह जने झुलस गए। कुछ दिन पूर्व हमीरगढ क्षेत्र के तख्तपुरा गांव में भी एक दलित दूल्हे को घोडी से उतार दिया गया। भीलवाडा जिले में एक यज्ञ में दलितों को शामिल करने को लेकर भी विवाद की स्थिति है। दलितों पर अत्याचार की घटनाएं अन्य जिलों में भी सामने आती रहती हैं। ऎसी घटनाओं पर स्वार्थ की रोटियां सेंकने वाले नेताओं व संगठनों की भी कमी नहीं है। इनसे दलितों को भी सावधान रहना होगा। सरकार को भी यह समझना होगा कि दलित सुरक्षा के कानून बना देने से उनको समाज में व्यावहारिक धरातल पर समानता का हक नहीं हासिल होगा। इसके लिए जरूरत सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की है। दलित समाज की बिन्दोली को रोकने के पीछे के कारणों को खोजना होगा। दलितों को बराबरी का नहीं मानने वाले लोगों को कानून की लाठी से हांकने के बजाय सामाजिक स्तर पर उनकी मानसिकता बदलनी होगी। गांव में दलितों को बराबरी का हक नहीं देने वालों को भी अब समझ लेना होगा कि जमाना बदल चुका। अब किसी जाति या व्यक्ति को अछूत या नीचे के स्तर का नहीं माना जा सकता। दलितों में सुरक्षा का भाव जागृत करने के लिए प्रशासन के साथ गांव के प्रभावशाली तबकों को भी पहल करनी होगी।

सोमवार, 11 मई 2009

चुनावी चौसर पर रक्तपात


यह घोर विडम्बना है कि राजनीति में नैतिकता के मन्त्र-द्रष्टा महात्मा गांधी के इस देश में बाहुबलियों एवं अपराधियों का जोर बढ रहा है। लोक दिखावे के लिए राजनीति के अपराधीकरण की सभी पार्टियां निन्दा कर चुकी हैं, परन्तु हाथी के दांत खाने और दिखाने के और। नैतिकता की दुहाई देने वाली राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में अपराधी गिरोहों का सहयोग लेने में कोई हिचक महसूस नहीं हो रही है। लोकसभा चुनावों में इस बार भी नामी-गिरामी गैंगस्टरों, हिस्ट्रीशीटरों, माफिया डॉनों की भरमार रही। अब तो राजस्थान जैसे शांत प्रदेश में भी खुलकर गोलियां चलीं तथा हथियारों और बाहुबल का जमकर उपयोग और प्रदर्शन हुआ।
आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों की तीन श्रेणियां हैं- वे जो सजायाफ्ता हैं, वे जिनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल हैं और वे जो आरोपी हैं। कई सजायाफ्ता या आरोपी नेताओं ने इस बार अपनी बीवियों को पार्टियों के टिकट दिला दिए हैं। बिहार इसमें अग्रणी है। वहां बाहुबलियों का बोलबाला है और घोटालों का घटाटोप है। राजद सुप्रीमो लालू स्वयं 950 करोड के चारा घोटाले में फंसे हैं। इसी दल के निवर्तमान सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन सजायाफ्ता होने की वजह से सीवान से चुनाव नहीं लड पाए, तो उन्होंने बेगम हिना शहाब को राजद का टिकट दिलवा दिया। राजद सांसद एवं हत्या के आरोप में वर्षो से जेल में बंद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव फिलहाल जमानत पर रिहा हैं। चुनाव लडने की उन्हें इजाजत नहीं मिली, तो उनकी पत्नी रंजीत रंजन अब कांग्रेस टिकट पर सुपौल से चुनाव मैदान में उतर गई। माफिया डॉन सूरजभान भी चुनावी जंग में उतरने के लिए पूरी तरह से तैयार थे, परन्तु हाईकोर्ट से इजाजत न मिलने पर उन्होंने अपनी पत्नी को लोजपा का टिकट दिलवा दिया। उत्तर प्रदेश भी माफिया डॉनों के लिए कुख्यात है। चौदहवीं लोकसभा में उत्तर प्रदेश के 80 सांसदों में से 23 के खिलाफ आपराधिक मामले लम्बित थे। इस बार भी 30 से अधिक "माफिया डॉन" चुनावी अखाडे में उतरे। समाजवादी पार्टी को गुण्डों का दल कहने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश में आपराधिक छवि वाले नेताओं को जमकर टिकट बांटे। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति सम्बन्धी याचिका उच्चतम न्यायालय में लम्बित है। इसमें उनके पुत्रों- अखिलेश यादव (सांसद) व प्रतीक यादव को भी पक्षकार बनाया गया है। सपा ने भी बाहुबलियों को टिकट से नवाजा है, जिनमें गोंडा से बृजभूषण सिंह, फतेहपुर से राकेश सचान, फैजाबाद से मित्रसेन यादव, धारहारा से ओ.पी. गुप्ता, मिर्जापुर से ददुआ डकैत का भाई बालकुमार प्रमुख हैं।
चुनाव में बाहुबलियों के दखल और धनबल के प्रभाव में नजर आ रही वृद्धि भी केवल "टिप ऑफ द आइसबर्ग" है। स्पष्ट है कि पहले राजनीतिज्ञ बाहुबलियों से धन और बल की मदद लेते थे और बदले में उन्हें संरक्षण देते थे। जब बाहुबलियों ने देखा कि राजनेता उनकी मदद से ही विधायक या सांसद बन रहे हैं तो उन्होंने सोचा कि क्यों न वे स्वयं ही धन और बाहुबल के माध्यम से सीधे चुने जाएं। इसलिए राजनीति की अपराधीकरण के शैशवकाल में जो अपराधी अपने बचाव के लिए राजनीतिज्ञ का दामन थामता था, उसने आज चुनाव प्रक्रिया के द्वारा स्वयं राजमुकुट धारण कर लिया है। आज भ्रष्ट राजनीतिज्ञ, धनलोलुप उद्योगपति, रिश्वतखोर राज्य कर्मचारी एवं माफिया डॉन का गठजोड बन गया है, जो समाज को लील रहा है। एन.एन. वोरा ने अपनी खोजपूर्ण रिपोर्ट में राजनीति के अपराधीकरण एवं अपराधीजगत के राजनीतिकरण का सांगोपांग विवेचन करते हुए लिखा था कि इस गठजोड ने एक "समानान्तर सरकार" स्थापित कर ली है, जो न्याय-व्यवस्था एवं राष्ट्र की सुरक्षा के लिए घातक है, परन्तु आज तो "माफिया" सरकार को ही "हाईजैक" करना चाहता है।
आज राजनीतिक दलों के टिकट बांटने का पैमाना बदल चुका है। बाहुबली, धन कुबेरों, कबीलाई सरदारों को बिन मांगे टिकट मिलने लगा है। जब ऎसे लोग चुनकर आएंगे तो संसद में क्या होगा।

शुक्रवार, 8 मई 2009

बुराइयां पहले


ये बुराइयां पहले की अपेक्षा कम नहीं हुई हैं, बल्कि बढी हैं। इनके रू प, प्रकार और किस्मों में अन्तर आया है। द्यूत अब कई रू पों में देखने को मिलता है। लॉटरी आदि के जरिए सरकार खुद इस तरह के उपक्रम करती है। टीवी के कई चैनल भी इस तरह के इनामी प्रोग्राम संचालित करते हैं। मांस उत्पादन के कई प्रांतों में कारखाने लगे हुए हैं। इसकी खपत को देखते हुए सरकार कत्लखानों की संख्या बढाने पर विचार कर रही है। वेश्यावृति का धंधा करने वालों की बडे शहरों में एक पूरी कॉलोनी बस गई है। आज की भाषा में इसे "रैड लाइट एरिया" कहते हैं। देश में यौन रोगों के और असाध्य रोगों के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी ये ही हैं। शराब के बारे में कुछ न कहना ही ठीक है। सरकार द्वारा कानूनी मान्यता प्राप्त हो जाने के बाद इसकी खपत शहरों और गांवों में समान रू प से है। समाज में अपराध और हिंसा को सर्वाधिक बढावा इस नशीले पदार्थ से ही मिला है। बहुधा ऎसा होता है कि हमारे गांव में प्रवेश करने से पूर्व स्वागत द्वार के पहले "देशी शराब की दुकान" का बोर्ड दिखाई देता है। राजस्थान में कहावत है- "गांव की साख बाडां भरै।" बाड गांव का पहला दरवाजा या प्रवेश द्वार होती है। गांव में शराब का ठेका है तो सच्चरित्रता और नैतिकता को वहां कितना महत्व मिलेगा, यह सोचने की बात है। अभी इन दिनों में एक-दो सप्ताह के बीच हम गांवों में गए तो वहां मेरे पास कुछ बहिनें आई, कुछ भाई भी आए। उनकी ओर से प्रार्थना की गई कि महाराज! जैसे भी हो, शराब की लत से छुटकारा दिलाएं। मैंने कहा- "क्या हुआ उन बहनों ने बताया कि शराब पीकर घर में उत्पात करना और हम लोगों की, बच्चों की पिटाई करना रोज की बात है। घर जैसे नरक बन गया है।"