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बुधवार, 8 सितंबर 2010

शिखरों पर शून्य

मोटे तौर पर देखें तो भारत में सब ठीक-ठाक ही चल रहा है। न हम किसी युद्ध में फंसे हैं, न कोई दंगे हो रहे हैं, न चीन और पाकिस्तान की तरह हजारों लोग बाढ़ में मर रहे हैं, न सरकार के गिरने की कोई नौबत है। विकास दर में बढ़ोतरी हो रही है, महंगाई थोड़ी घटी है, करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों को हम करोड़ों रुपए यों ही दे देते हैं। हमारे दिल्ली जैसे शहर यूरोपीय शहरों से होड़ ले रहे हैं।

हजारों करोड़ रुपए हम खेलों पर खर्च कर रहे हैं तो फिर रोना किस बात का है? देश में एक अजीब-सा माहौल क्यों बनता जा रहा है? खासतौर से तब जबकि देश के दो प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा पक्ष और विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय पक्ष और अनुपक्ष की तरह गड्ड-मड्ड हो रहे हैं?

ऐसा क्या है, जो देश को दिख तो रहा है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है?,जो समझ में नहीं आ रहा, वह एक पहेली है। पहेली यह है कि देश में संसद है, सरकार है, राजनीतिक दल हैं, लेकिन कोई नेता नहीं है? सोनिया गांधी लगातार चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गईं। रिकॉर्ड बना, लेकिन कोई लहर नहीं उठी। डॉ मनमोहन सिंह ने भी रिकॉर्ड कायम किया। नेहरू और इंदिरा के बाद तीसरे सबसे दीर्घकालीन प्रधानमंत्री हैं, लेकिन वे हैं या नहीं हैं, यह भी देश को पता नहीं चलता।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है। ऐसी स्थिति, जिसमें होना न होना एक बराबर ही होता है। इसमें जरा भी शक नहीं कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच जैसा सहज संबंध है, वैसा सत्ता के गलियारों में लगभग असंभव होता है। भारत में सत्ता के ये दो केंद्र हैं या एक, यह भी पता नहीं चलता। न तो उनमें कोई तनाव है और न ही स्वामी-दास भाव है, जैसा कि हम व्लादिमीर पुतिन और दिमित्री मेदवेदेव के बीच मास्को में देखते हैं।

इसी प्रकार सत्ता पक्ष और विपक्ष देश में है तो सही, लेकिन कहीं कोई चुनौती दिखाई नहीं पड़ती। छोटे-मोटे क्षेत्रीय दल जो कांग्रेस के साथ हैं, उनके नेता भ्रष्टाचार के ऐसे मुकदमों में फंसे हुए हैं कि कांग्रेस ने जरा स्क्रू कसा नहीं कि वे सीधे हो जाते हैं।

जिस बात का वे निरंतर विरोध करते हैं, उसी पर दौड़कर समर्थन दे देते हैं। जैसा कि परमाणु सौदे पर पिछली संसद में हुआ था। कांग्रेस का हाल भी वही है। वह उनके ब्लैकमेल के आगे तुरंत घुटने टेक देती है। जिस जातीय गणना का कांग्रेस ने 1931 में और आजाद भारत में सदा विरोध किया, अब कुछ जातिवादी क्षेत्रीय दलों के दबाव में आकर उसने अपनी नेता की भूमिका तज दी और अब वह उन अपने समर्थक दलों की पिछलग्गू बन गई है।

सत्तारूढ़ कांग्रेस सत्ता पर आरूढ़ जरूर है, लेकिन कई मुद्दों पर वह पत्ता भी नहीं हिला सकती। इससे भी ज्यादा दुर्दशा विपक्षी दलों की है। कम्युनिस्ट पार्टियां अभी भी मुखर हंै, लेकिन पिछले चुनाव में वे अपने गढ़ों में ही पिट गईं। उनका आपसी लत्तम-धत्तम इतना प्रखर हो गया है कि उनके मुखर होने पर देश का ध्यान ही नहीं जाता। जोशी-डांगे-मुखर्जी और नंबूदिरिपाद की कम्युनिस्ट पार्टियों में आज के जैसा संख्या-बल नहीं था, लेकिन वाणी-बल था, जो सारे देश में प्रतिध्वनित होता था।

नेहरू जैसे नेता को भी उस पर प्रतिक्रिया करनी पड़ती थी। आजकल यही पता नहीं चलता कि वामपंथ का असली प्रवक्ता कौन है। मार्क्‍सवादी पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने परमाणु-हर्जाना विधेयक का विरोध जरूर किया, लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की तरह डूब गया। वे दिन गए, जब लोहिया के पांच-सात लोग पूरी संसद को अपनी चिट्टी उंगली पर उठाए रखते थे। अब दिन में दीया लेकर ढूंढ़ने निकलो तो भी कोई समाजवादी नहीं मिलता।

इतनी बड़ी संसद में क्या एक भी सांसद ऐसा है, जो लोहिया की तरह पूछ सके कि प्रधानमंत्रीजी, आप पर 25000 रुपए प्रतिमाह कैसे खर्च हो रहे हैं और आम आदमी तीन आने रोज पर कैसे गुजारा करेगा? अब तो पूंजीवादी, समाजवादी, साम्यवादी, दक्षिणपंथी और वामपंथी- सभी एक पथ के पथिक हो गए हैं।

सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर भाजपा जबर्दस्त भूमिका निभा सकती थी, लेकिन वह बिना पतवार की नाव बन गई है। उसका अध्यक्ष भी कांग्रेस अध्यक्ष की तरह आसमान से उतरने लगा है। वह अपने नेताओं के कंधों पर बैठा है, लेकिन उसके पांव नहीं हैं। उसे पांव की जरूरत भी क्या है?

भाजपा में हाथ-पांव ही हाथ-पांव हैं। यह कार्यकर्ताओं की पार्टी ही तो है। इसमें गलती से एक नेता उभर आया था। उसे जिन्ना ले बैठा। अब कांग्रेस की तरह भाजपा के शिखर पर भी शून्य हो गया है। ये शून्य-शिखर आपस में जुगलबंदी करते रहते हैं। शून्य-शिखरों की इस जुगलबंदी में से कुछ समझौते निकलते हैं और कुछ शिष्टाचार निभते हैं, लेकिन कोई वैकल्पिक समाधान नहीं निकलते। भारत की राजनीति में से द्वंद्वात्मकता का तिरोधान हो गया है।

यह एकायामी (वन डायमेंशनल) राजनीति नौकरशाहों और सरकारी बाबुओं के कंधों पर टिकी हुई है। इसमें पार्टियों की भूमिका गौण हो गई है। जनता और सरकार के बीच पार्टी नाम का सेतु लगभग अदृश्य हो गया है। जब पार्टी ही अप्रासंगिक हो गई है तो नेता की जरूरत कहां रह गई है? बिना नेता के ही यह देश चला जा रहा है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा अजूबा है। बाबुओं के दम पर बाबुओं का राज चल रहा है। आम जनता के प्रति हमारे बाबुओं का जो रवैया होता है, वही आज हमारे नेताओं का है।

देश में अगर आज कोई नेता होता तो क्या वह अनाज को सड़ने देता? यह ठीक है कि उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में टांग नहीं अड़ानी चाहिए, लेकिन भूखों को मुफ्त बांटने के विरुद्ध ऐसे तर्क वही दे सकता है, ‘जाके पांव फटी न बिवाई’! सरकार तो सरकार, विपक्ष क्या कर रहा है?

वह उन गोदामों के ताले क्यों नहीं तुड़वा देता? धरने क्यों नहीं देता? सत्याग्रह क्यों नहीं करता? भ्रष्टाचार क्या सिर्फ केंद्र में है? क्या राज्य सरकारें दूध की धुली हुई हैं? भाजपा और जनता दल के राज्यों में कोई चमत्कारी कदम क्यों नहीं उठाया जाता? माओवादियों से पांच-सात राज्य ऐसे लड़ रहे हैं, जैसे वे पांच-सात स्वतंत्र राष्ट्र हों। क्यों हो रहा है, ऐसा? इसीलिए कि देश में कोई समग्र नेतृत्व नहीं है। चीनियों के आगे भारत को क्यों घिघियाना पड़ रहा है?

कश्मीर में कोरे शब्दों की चाशनी क्यों घुल रही है? कोई बड़ी पहल क्यों नहीं हो रही है? इसीलिए कि भारत की राजनीति के बगीचे में सिर्फ गुलदस्ते सजे हुए हैं। इन गुलदस्तों में न कोई कली चटकती है और न फूल खिलते हैं। जो फूल सजे हुए हैं, उनमें खुशबू भी नहीं है। भारत का नागरिक समाज या चौथा खंभा भी इतना मजबूत नहीं है कि वह नेतृत्व कर सके। इसके बावजूद भारत है कि चल रहा है। अपनी गति से चल रहा है। शिखरों पर शून्य है तो क्या हुआ? मूलाधार में तो कोई न कोई कुंडलिनी लगी हुई है।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

संघ का संकट और पटेल-नेहरू से सबक

इतिहास इंसानों से बनता है लेकिन उसमें इंसानों की तरह अहं नहीं होता। ये सबक इतिहास ही देता है इसलिए इतिहास सत्य की खोज के साथ-साथ बदलता रहता है।

इतिहास में अजीब तरह का लचीलापन होता है जो अमूमन वैचारिक पार्टियों और जिद्दी इंसानो में नहीं दिखाई देता है। इतिहास चिरंतन अपनी गति से चलता रहता है और समयानुसार अपने में बदलाव भी करता है बिना अहं बीच में लाए। और इतिहास को अगर ध्यान से देखें तो उसमें एक ध्रुव पर वल्लभभाई पटेल दिखते हैं तो दूसरे पर जवाहर लाल नेहरू।

....पटेल बीमार हैं और नेहरू उनको देखने गए हैं। पटेल नेहरू से कहते है कि 'तुम मुझपर विश्वास नहीं करते।' नेहरू पलट के कहते हैं कि 'मेरा तो खुद पर से ही भरोसा उठ गया है'... नेहरू और पटेल की ये बात भारतीय इतिहास का वह बिंदु है जो इतिहास को बना भी रहा था और इतिहास को बिगाड़ भी सकता था। दोनों नेताओं के बीच भयानक मतभेद थे और दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी भी थे लेकिन अपने मतभेदों को इस हद तक नहीं ले गए कि टूट का संकट पैदा हो जाए।

बीजेपी और संघ परिवार के मौजूदा विवाद को इतिहास की नजर से देखने और समझने के लिए इतिहास के इस टुकड़े को समझना बेहद आवश्यक है। क्योंकि जिन्ना विवाद हो या फिर संघ परिवार की गुटबाजी बेहद खतरनाक आयाम लेती जा रही है जो कांग्रेस के बरक्स एक वैकल्पिक सत्ता की अकाल मौत का कारण हो सकती है जो देश के लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा।

इस विवाद ने कई चीजें साफ कर दी हैं। एक, संघ परिवार एक लंबे संकट से गुजर रहा है। चूंकि बीजेपी उसका सबसे बड़ा चेहरा है इसलिए बीजेपी पर इस संकट की सबसे बड़ी छाप दिखाई दे रही है। दूसरे, संघ परिवार का ये संकट पटेल नेहरू की तरह वैचारिक ज्यादा है। बीजेपी में दो तरह की धारायें एक दूसरे से टकरा रही हैं। एक वो धारा जो मान रही है कि बीजेपी लगातार दो चुनाव हारी क्योंकि वो अपने मूल वैचारिक चरित्र से भटकी यानी उसने उग्र हिंदूत्ववाद से समझौता किया। और दूसरी वो धारा है जो ये मानती है कि संघ परिवार को सर्वस्वीकार्य बनने के लिये जरूरी है कि वो अपने में बदलाव करे और उग्र हिंदूत्ववाद में लचीलापन लाए और अल्पसंख्यक तबके को अपना बनाने की कोशिश करे।

तीसरा, ये संकट इस बात का भी प्रतीक है कि संघ में दो धाराओं के साथ-साथ दो पीढ़ियों का भी टकराव है। नई पीढ़ी अपने हिसाब से संघ को चलाना चाहती है लेकिन पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को वो जगह नही दे रही है जो उसे मिलनी चाहिए। साफ शब्दो में कहें तो संघ प्रमुख मोहन भागवत और लाल कृष्ण आडवाणी के बीच सत्ता संघर्ष है। दिलचस्प बात ये है कि आडवाणी से उम्र में कम होने के बावजूद भागवत संघ और बीजेपी को उग्र हिंदूत्ववाद की तरफ ले जाना चाहते है और पुरानी पीढ़ी के आडवाणी बदलते समाज और लोकतंत्र की जरूरत के मुताबिक विचारधारा के स्तर पर बदलाव की वकालत कर रहे हैं।

चौथे, संघ परिवार सामाजिक और राजनीतिक संगठन का फर्क भी नहीं समझ पा रही है, वो बीजेपी को एक सामाजिक संगठन की तरह चलाना चाहती है जो संभव नहीं है। सामाजिक संगठन में संगठनात्मक मजबूती तो होती है लेकिन राजनीतिक संगठन की तरह सर्वशक्तिमान होने की संभावना नहीं होती है। आरएसएस एक सामाजिक संगठन है, उसकी ताकत अपार है, उसके बिना बीजेपी काफी कमजोर हो जाएगी लेकिन बीजेपी अगर सत्ता में आ जाए तो उसका नेता देश का प्रधानमंत्री होगा और एक प्रधानमंत्री कितना भी कमजोर होगा आरएसएस प्रमुख की ताकत उसका मुकाबला नहीं कर पाएगी।

ये बात जब वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो सुदर्शन को समझ नहीं आई और उनको लगता था कि वो नागपुर से बीजेपी और वाजपेयी को हांक सकते है। शुरू में जसवंत सिंह को वित्त मंत्री न बनने देकर लगा वो कामयाब होंगे लेकिन जब प्रधानमंत्री ने अपनी ताकत दिखाय़ी तो संघ परिवार के पास वाजपेयी के सामने नतमस्तक होने के अलावा कोई चारा नही था।

सुदर्शन और अशोक सिंघल लाख कहते रहे कि तब प्रधानमंत्री कार्यालय में अमेरिकी एजेंट है लेकिन चीखने के सिवाय कुछ कर नहीं पाए। आरएसएस को ये बात समझनी चाहिए लेकिन वो उस भारतीय परंपरा में जवाब तलाशते हैं जिसमें चक्रवर्ती सम्राट किसी संत मुनि के आने के बाद अपने सिंहासन से उठ कर उनका स्वागत करता है।

संघ परिवार ये मानता है कि नैतिक सत्ता के आगे राजनीतिक सत्ता को झुकना चाहिए लेकिन वैदिक काल और कलयुग का अंतर न समझने की वजह से ही भागवत अब आडवाणी को अपने सामने झुकाना चाहते हैं जो संभव नहीं। पांच, इस नासमझी की वजह से संघ परिवार ने जिद ठान ली है और वो पार्टी के अंदर हार के बाद होने वाले वैचारिक मंथन को भी बगावत की नजर से देख रहा है।

विचारधारा स्वाभावत: तानाशाही होती है चाहे वो साम्यवाद हो या फिर हिंदूवाद या फिर हिटलर का फांसीवाद या अल कायदा का रैडिकल इस्लाम। संघ को ये समझना होगा कि देश बदला है और आम जनमानस में जबर्दस्त परिवर्तन आया है, वो विचारों की स्वतंत्रता में अपने और अपने समाज की अस्मिता खोजती है और ऐसे में विचार पर पाबंदी लग जाये वो कतई नहीं चाहेगी। संघ परिवार को अपने आराध्य इतिहास देव वल्लभभाई पटेल से सबक लेना चाहिए और शायद नेहरू से भी जिनको 'डी - कंस्ट्रक्ट' करने का कोई भी मौका वो गंवाना नहीं चाहती।

सबको पता है कि नेहरू समाजवाद से प्रभावित थे तो पटेल दक्षिणपंथ से या यों कहें हिंदूवाद से। चाहे वो कश्मीर का मुद्दा हो या फिर चीन का या फिर अल्पसंख्यक नीति, दोनों नेता अलग-अलग ध्रुव पर खड़े थे। दोनों नेताओं के अपने अपने समर्थक थे जो दोनों को अपने-अपने हिसाब से प्रभावित करने के उधेड़बुन में लगे रहते थे। रफी अहमद किदवई ने तो एक बार पटेल और उनकी दक्षिणपंथी नीतियों के चलते नेहरू को ये सुझाव भी दिया था कि उन्हें इन दकियानूसी लोगों का साथ छोड़ समाजवादी पार्टी बनानी चाहिए थी।

हिंदूस्तान टाइम्स के संपादक 'दुर्गा दास' अपनी किताव 'इंडिया फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर' में लिखते हैं कि रफी अहमद को पूरा भरोसा था कि अगर नेहरू नई पार्टी बनाएंगे तो वो पहले आम चुनाव में आसानी से बहुमत ले आएंगे और समाजवादी नीतियों को लागू करने मे कोई दिक्कत नहीं आएगी। नेहरू ने तब जवाब दिया था कि 'अभी जरूरत आजादी को मजबूत करने की है' और ये जानते थे कि वो और पटेल ये काम मिलकर कर सकते है अकेले नहीं।

ऐसा नहीं था कि दोनों में तकरार नहीं होती थी। कई बार दोनों नेताओं ने इस्तीफे तक देने की धमकी दे डाली थी। नेहरू की इच्छा के विरुद्ध पुरुषोत्तम दास टंडन जब कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए तो नेहरू ने पार्टी और सरकार दोनों से इस्तीफा देने का मन बना लिया था लेकिन ऐसा हुआ नहीं, कुछ नेहरू के इतिहासबोध की वजह से और कुछ टंडन के बड़प्पन के कारण।

एक बार कैबिनेट की बैठक में नेहरू और पटेल के बीच कहासुनी हो गई, नेहरू ने मेज पर मुक्का मारते हुए कहा 'पटेल तुम्हारे जो मन में आये करो'। पटेल बहुत नाराज हो गए, उन्होंने दुर्गादास से कहा 'नेहरू पागल हो गये है और अब मैं उनको बर्दास्त करने को तैयार नहीं हूं'।

दुर्गादास के मुताबिक पटेल ने उनसे कहा कि वो गांधीजी के पास जा रहे हैं और उनसे कहेंगे कि वो इस्तीफा दे देंगे। दुर्गादास ने कहा कि 'गांधी जी उनको कभी भी छो़ड़ने नहीं देगे क्योंकि गांधी जी मानते हैं कि पटेल और नेहरू दो बैलों की जोड़ी हैं जो सरकार को खींच रहे हैं'। तब झल्ला कर पटेल बोले 'बुड्ढा सठिया गया है, वो समझते हैं कि माउंटबेटेन हमारे और नेहरू के बीच बीचबचाव कर सकते हैं'।

पटेल ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले एक जगह कहा भी है कि 'मैं नेहरू से बेहद स्नेह करता था लेकिन नेहरू ने कभी भी मुझे इस लायक नहीं समझा'। ये झगड़ा गांधी के समय भी था और उनके बाद भी बना रहा लेकिन अगर इस झगड़े में अहं का टकराव होता और अपने दरबारियों की बात में आकर दोनों अपने रास्ते अलग कर लेते तो शायद भारत का इतिहास कुछ और होता और या शायद हम आज लोकतंत्र भी नहीं होते।

ये वो वक्त था जब तमाम मतभेदों के बीच संविधान बन रहा था, दंगे हो रहे थे, विभाजन का दर्द झेलते लाखों करोड़ो लोगों का खयाल रखना था, पांच सौ से ज्यादा छोटे-छोटे राजाओं को देश में मिलाना था, साम्यवादियों का तेलंगाना आंदोलन दबाना था, कश्मीर पर पाकिस्तान का हमला निपटना था और सबसे बड़ी बात, आजादी की नींव को मजबूत करना था।

दोनों ने अपने अहं को अहमियत नहीं दी इतिहास में अपनी भूमिका को पहचाना और अपने उसूलों से समझौता किए बिना दो बैलों की जोड़ी बने रहे। शायद आज आडवाणी और भागवत को इसी इतिहास दृष्टि से काम लेना होगा नहीं तो संघ परिवार तो रहेगा लेकिन इतिहास सम्मान की नजर से इन्हें देखेगा इसमे संदेह है। क्योंकि ये सही है कि इतिहास में अहं नहीं होता लेकिन वो भूलता भी नहीं है और खासतौर से उनको जो इतिहास को नहीं समझते और न ही उससे सबक लेते हैं।

बुधवार, 15 जुलाई 2009

बजट है भविष्य के गर्भ में

दुनिया के सबसे गरीब देश, जिसे गरीबी रेखा मानते हैं, के मुताबिक भारत में दस में से चार भारतीय से भी ज्यादा गरीबी रेखा से नीचे आते हैं। नासो की मानें तो देश की ग्रामीण आबादी में 19 फीसदी लोग रोजाना 12 रुपए में गुजारा करते हैं। हमारे यहां एक ग्रामीण परिवार एक माह में महज 365 रुपए में प्रति व्यक्ति खर्च कर गुजारा करता है, जबकि शहरी क्षेत्र की २२ फीसदी आबादी प्रति व्यक्ति 19 रुपए खर्च करती है। मसलन एक व्यक्ति महीने भर में 580 रुपए में अपना जीवन गुजारता है। शहरों में खाने पर लोग औसतन 451 रुपए खर्च करते हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में महज २५१-४क्क् रुपए में गुजारा करते हैं।

केंद्र सरकार ने बिजली भले प्राथमिकता सूची में रखी हो, लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 42 फीसदी घरों में आज भी बिजली उनके लिए सपना है। कहने को वहां ५६ फीसदी घरों में बिजली उपलब्ध है। लेकिन जब शहरों में 12 से 14 घंटों बिजली न रहती हो, उस हालत में ग्रामीण इलाकों में बिजली की आशा बेमानी है। असल में बिजली तो नगरों-महानगरों में, राजधानियों में माननीयों-महामहिमों और उद्योगों से बचे, तब तो ग्रामीण शहरी इलाकों में पहुंचे।

सच में गावों के 42 फीसदी लोग मिट्टी के तेल से रोशनी पाते हैं, वह भी ब्लैक में खरीदकर। जहां तक खाना बनाने का सवाल है, गांव के 74 फीसदी घरों में तिनके और लकड़ियों से खाना बनता है। भले वहां के नौ फीसदी घरों में रसोई गैस से खाना बनता हो, लेकिन असल में इतनी ही फीसदी लोग उपलों से खाना बनाते हैं। हालत तो यह है कि १७ बड़े राज्यों में से सात राज्यों में १९ फीसदी ग्रामीण कच्चे घरों में रह रहे हैं, वहीं 50 फीसदी लोगों के घर पक्के और 31 फीसदी के घर आधे पक्के थे। यह हमारे गांवों की हकीकत है।

विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में भौगोलिक हिसाब से सबसे ज्यादा बदतर हालात का सामना करने वाले इसी देश के लोग हैं। इसमें दो राय नहीं कि भारत घनी आबादी वाला दुनिया का सबसे पिछड़ा देश है और देश के 60 फीसदी गरीब लोग देश के प्रमुख राज्यों में रहते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि खुशहाली गांव में बैठे-बिठाए यानी एक जगह टिके रहने से नहीं आती। रिपोर्ट के मुताबिक रोजगार की खातिर शहरों-महानगरों की ओर जाने की प्रवृत्ति सकारात्मक है, स्वाभाविक है।

लोगों को निर्धनता से छुटकारा मिलना ही चाहिए। शहरीकरण के अलावा इसका कोई चारा नहीं है। लेकिन खेद है कि शहरी प्रशासन रोजगार की तलाश में आने वालों के प्रति नकारात्मक रवैया रखता है। यही नहीं, उनके बेहतर जीवनयापन के लिए सुविधाएं मुहैया करने के मामले पर हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। और तो और वह उनके लिए आवास, स्कूल, सफाई, सड़क, सुरक्षा, बिजली, पानी और आवागमन आदि की व्यवस्था करने में भी आनाकानी और बिना वजह देरी करता है।

नतीजतन लोग अपनी जरूरत और अधिकार पूरे करने की खातिर मजबूरन कानून अपने हाथ में ले लेते हैं। विडंबना यह है कि गांव-देहात से और आदिवासी अंचल से चुनकर आए जनप्रतिनिधि भी इनकी सुध नहीं लेते और हर पल अपनी सुविधाओं तथा वेतन बढ़ाने की जुगत में रहते है। आजकल इस साल के बजट को आजाद भारत का सबसे अच्छा बताया जा रहा है, देखना यह है कि यह इन लोगों का कहां तक भला कर पाएगा। यह तो भविष्य के गर्भ में है।

रविवार, 21 जून 2009

स्वीकार्य नहीं गुजकोका

केन्द्र सरकार ने दूसरी बार गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण कानून (गुजकोका) को अमान्य कर दिया है। पिछली बार मनमोहन मंत्रिमंडल ने जब इसे राज्य विधानसभा को वापस भेजने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी, तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने "वोट बैंक राजनीति" और "विरोधी दलों की सरकारों के साथ कांग्रेस के भेदभाव" का आरोप लगाया था, पर शायद इस बार वे ऎसा नहीं कर पाएंगे।
दरअसल केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच पत्र व्यवहार का संवेदनशील ब्यौरा उजागर नहीं करने की परम्परा है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद "गुजकोका" को वापस भेजने के निर्णय की संवाददाताओं को जानकारी देते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम् ने इस पर तीन आपत्तियां बताईं। इससे मोदी के इस दावे की पोल खुल गई कि संशोधित "गुजकोका" भी कर्नाटक और महाराष्ट्र के आतंक-विरोधी कानूनों की तरह है। हकीकत यह है कि गुजरात सरकार "गुजकोका" के जरिये ऎसे अपरिमित अधिकार चाहती है, जो मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली कोई लोकतांत्रिक सरकार स्वीकार नहीं कर सकती।
गुजकोका के प्रावधानों पर केन्द्र की पहली आपत्ति यह है कि इसमें पुलिस अधिकारी के समक्ष इकबालिया बयान को अदालत में स्वीकार्य बनाया गया है। सभी जानते हैं कि पुलिस मामूली चोरी को भी कबूल करवाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाती है। यही नहीं गुजकोका में एक प्रावधान यह भी किया गया है कि यदि लोक अभियोजक विरोध करे तो अदालत जमानत मंजूर नहीं कर सकती। यह तो हद हो गई! फिर अदालत की जरू रत ही क्या है मुल्जिम को लोक अभियोजक के समक्ष पेश कर ही जमानत पर फैसला करवा लिया जाए। केन्द्र सरकार को गुजकोका की धारा 20 (2) पर भी आपत्ति है। इस धारा में प्रावधान संभवत: इतना "संवेदनशील" है कि चिदम्बरम् को चुप्पी ही साधनी पडी। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि ये तीन संशोधन गुजरात सरकार कर दे, तो केन्द्रीय मंत्रिमंडल उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज सकता है। क्या मोदी अब भी यही दावा करेंगे कि केन्द्र सरकार "भेदभाव" कर रही है भले ही गुंडे, डाकू, उग्रवादी, फिरकापरस्त और आतंककारी मानवाधिकारों की इज्जत नहीं करते, पर लोकतांत्रिक समाज तो उन्हें इनसे कतई वंचित नहीं कर सकता। गुजरात सरकार को भी यह बात माननी ही पडेगी

सोमवार, 1 जून 2009

आरटीआई क्षेत्र में बेहतर काम का मिलेगा पुरस्कार

सूचना अधिकार कानून आजाद भारत में आम आदमी को मिला शायद सबसे धारदार हथियार है। यह ऐसा अधिकार है जो गांव की गली में बिछे खड़ंजे की लागत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों की माली हैसियत पर भी सवाल पूछने की ताकत देता है। यह कानून जिन लोगों के दम पर चला और दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते बेहाल हुए इंसान के हक की आवाज बन सका, लगन के धनी ऐसे लोगों को अब राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा सकेगा। पब्लिक काज रिसर्च फाउंडेशन (पीसीआरएफ) देश भर के चुनिंदा आरटीआई एक्टीविस्ट को नवंबर में पुरस्कृत करेगी। सूचना का अधिकार कानून को और लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से शुरू सूचना का अधिकार-राष्ट्रीय पुरस्कार 2009 में पहले दो पुरस्कार सरकारी दफ्तरों में तैनात उन जनसूचना अधिकारियों के लिए होंगे, जिन्होंने आवदेक को बिना दौड़ाए उसे जानकारी उपलब्ध करा दी। एक पुरस्कार आवेदनों पर फैसला लेने वाले सूचना आयुक्तों के लिए होगा और दो पुरस्कार सूचना आवेदकों के लिए होंगे। सभी पांचों विजेताओं को दो-दो लाख रुपये नकद, ट्राफी और सम्मान पत्र दिया जाएगा। इन पांच के अलावा अंतिम सूची में स्थान बनाने वाले प्रतिभागियों को भी संस्था एक ट्राफी देगी। देश में अपनी तरह के इन पहले पुरस्कारों के सूत्रधार अरविंद केजरीवाल के मुताबिक सभी आवेदन पहली जून से 30 जून तक स्वीकार किए जाएंगे। प्रविष्टियों पर विचार देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह, इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति, अभिनेता आमिर खान, पूर्व राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियन पुलेला गोपीचंद, नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन, दैनिक जागरण के संपादक संजय गुप्त, एनडीटीवी के अध्यक्ष डा. प्रणय राय और वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहन का निर्णायक मंडल करेगा।अब आते हैं पुरस्कारों के आधार पर। सूचना आयुक्तों और जनसूचना अधिकारियों के लिए मानक का आधार तो उनके दायित्वों का उचित निर्वहन ही होगा। लेकिन सूचना आवेदन करने वालों की दो श्रेणियां होंगी। केजरीवाल के अनुसार पहली श्रेणी उन लोगों की होगी जिनके आवेदन पर दिसंबर 2008 तक कोई बड़ा फैसला आया हो या उसका बड़ा इंपैक्ट हुआ हो। दूसरी श्रेणी में वे लोग होंगे जिनके आवेदन का जवाब तो नहीं आया, लेकिन उस पर असर उतना ही व्यापक हुआ। आशय यह कि कई बार सरकारी विभाग जवाब देने से तो डरते हैं लेकिन चुपचाप वांछित कार्रवाई भी कर देते हैं। सूचना आवेदकों की इन दोनों श्रेणियों को यह छूट भी है कि वे 2005 में सूचना कानून लागू होने से लेकर दिसंबर 2008 तक के अपने आवदेनों का ब्यौरा भेज सकते हैं।

सौ दिन का एजेंडा

इस सूचना से उत्साहित नहीं हुआ जा सकता कि संप्रग सरकार ने सौ दिन का अपना एजेंडा तय कर लिया है। फिलहाल यह जानना कठिन है कि इस एजेंडे में क्या शामिल है और क्या नहीं, लेकिन कोई भी अनुमान लगा सकता है कि उन समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर खोजने की रूप-रेखा बनाई गई होगी जो राष्ट्र के समक्ष उपस्थित हैं और जिन्हें गंभीर माना जा रहा है। यह भी स्पष्ट है कि मंदी का माहौल को दूर करना और पाकिस्तान से उबर रहे खतरे से बचे रहना इस एजेंडे का हिस्सा का होंगे, लेकिन इन समस्याओं के अतिरिक्त जो अन्य अनेक जटिल मुद्दे सतह पर हैं वे ऐसे नहीं कि केवल सौ दिन में उन्हें सुलझाया जा सके। इसी तरह यह भी स्पष्ट है कि संप्रग शासन के पास न तो कोई जादू की छड़ी है और न हो सकती है। यह संभव है कि केंद्र सरकार सौ दिन के एजेंडे के बहाने कुछ ऐसी घोषणाएं करने में समर्थ हो जाए जो जनता का ध्यान आकर्षित करने और उसमें उम्मीदों का संचार करने वाली हों, लेकिन यदि संप्रग सरकार दूसरी पारी में वास्तव में कुछ ठोस और बेहतर करना चाहती है तो फिर उसे शासन के तौर-तरीके बदलने के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत की शासन व्यवस्था जिस तरह से चलाई जा रही है उसमें आमूल-चूल परिवर्तन समय की मांग है। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले पांच वर्षो में विभिन्न समस्याओं का समाधान समितियों और आयोगों के जरिये खोजने की जो तरकीब अपनाई गई उससे देश को कुछ हासिल नहीं हुआ। पिछले पांच वर्षो में विभिन्न समितियों और आयोगों की सिफारिशें सामने तो आई, लेकिन वे विचार-विमर्श के बहाने ठंडे बस्ते में चली गई। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों को भी ठंडे बस्ते में डालने का काम किया गया। इसी तरह न्यायिक सुधार की बातें तो खूब की गई, लेकिन कुछ ठोस कदम उठाने से इनकार किया गया। कुछ आवश्यक कार्य ऐसे थे जो सत्ता में आते ही किए जाने चाहिए थे, लेकिन उनकी सुधि तब ली गई जब चुनाव सिर पर आ गए। इसी तरह कुछ कार्य तो पूरी तरह भुला ही दिए गए। दरअसल महत्वपूर्ण यह नहीं है कि सरकार ने सौ दिन के लिए क्या एजेंडा तय किया है, बल्कि यह है कि वह अपने कामकाज का रंग-ढंग बदलने जा रही है या नहीं? अच्छा तो यह होगा कि वह सौ दिन के अंदर उन तौर-तरीकों से छुट्टी पा ले जो सिर्फ लालफीताशाही के अस्तित्व में होने की कहानी कहते हैं। केंद्रीय सत्ता को उन अनेक परंपराओं से भी पीछा छुड़ा लेना चाहिए जिनकी आज के युग में कहीं कोई अहमियत नहीं रह गई है। बगैर ऐसा किए केंद्रीय शासन को गतिशील नहीं किया जा सकता और यदि केंद्रीय सत्ता के कामकाज में सुधार नहीं होगा तो राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली में शायद ही कोई परिवर्तन आए। भले ही सत्ता में वापसी के आधार पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल यह दावा करें कि यह संप्रग शासन की कार्य कुशलता और दक्षता का परिणाम है, लेकिन समझदारी इसी में है कि पिछले पांच वर्ष के कार्यकाल की नाकामियों पर ध्यान दिया जाए। यदि यह मानकर चला जाएगा कि नरेगा जैसी जन कल्याणकारी योजनाएं सही तरह चल रही हैं तो इसे यथार्थ की अनदेखी ही कहा जाएगा।

मंगलवार, 19 मई 2009

भटकती भाजपा


इस बार लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की वैसी ही स्थिति उभरकर सामने आई, जैसी कि पिछले लोकसभा चुनाव में आई थी। शायनिंग इण्डिया का नारा अंधेरे में दबकर रह गया था। अपनी इतनी बड़ी हार से भाजपा में बौखलाहट का बड़ा वातावरण भी दिखाई दिया। इस बार भी दावे तो आसमान से नीचे ही नहीं उतरे, किन्तु भाजपा चारों खाने चित्त हो गई। लालजी ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि यदि मैं पी.एम. नहीं बना तो घर लौट जाऊंगा।

न पी.एम. ही बने, न घर ही लौटे। भाजपा की यह सबसे बड़ी भूल साबित हुई कि उनको इतना पहले से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस सम्मान को पचा सकना उनके लिए असंभव हो गया। इस पूरे काल में उनके तेवर भी प्रधानमंत्री जैसे ही रहे। अन्तत: जनता ने ही उनके नेतृत्व को नकार दिया। चुनाव प्रचार के दौरान ही एक और समझदार नेता ने अपने पिटारे से मोदी का नाम छोड़ दिया। इसका एक अर्थ यह था भाजपा के एक धड़े को भी आडवाणी का नेतृत्व स्वीकार नहीं है और वह भी ऎन चुनाव के पहले। भाजपा का इससे बड़ा नुकसान तो कांग्रेस ने भी नहीं किया। इस घोषणा से नरेन्द्र मोदी भी फुफकारने लग गए। सभी नेताओं की वाणी से विष उगला जा रहा था। इसका परिणाम भी वही होना था। भाजपा के सहयोगी दलों ने भी मोदी को नकार दिया।

दिल्ली के गढ़ में भाजपा का एक संतरी भी नहीं बचा। उत्तराखण्ड में भी भाजपा को बैरंग लौटना पड़ा। राजस्थान में अकाल पड़ गया। मात्र चार सीटों पर संतोष करना पड़ा। चुनाव प्रचार में यहां भी बयानबाजी का बड़ा दौर चला था। गुलाब चन्द कटारिया की रथ यात्रा आगे बढ़ती गई और पीछे-पीछे भाजपा की चादर सिमटती चली गई। पहले ही दिन से उदयपुर की पांच सीटें कांग्रेस को जाती दिखाई दे रही थीं, राजसमन्द को छोड़कर। भाजपा के लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। राजस्थान में हम इन चुनावों के आंकड़ों को पिछले चुनाव के आंकड़ों से मिलाएं तो पता चल जाएगा कि भाजपा का मतदाता उदासीन होता जा रहा है। सन् 2003 में विधानसभा और सन् 2008 के विधानसभा में कांग्रेस के पक्ष का मतदान मात्र 1 प्रतिशत बढ़ा था, जबकि भाजपा के पक्ष में लगभग 5 प्रतिशत मतदाता घटे थे। सन् 2004 के और सन् 2009 के लोकसभा चुनाव कहानी को और आगे ले गए। कांग्रेस के पक्ष में 5.75 प्रतिशत वोट बढ़े, किन्तु भाजपा के पक्ष में टूट 12.44 प्रतिशत की हुई। शेष मतदाता वोट डालने नहीं आए।

कांग्रेस के हारे हुए विधायक सी.पी. जोशी और लालचन्द कटारिया सांसद चुने गए, जबकि भाजपा के जीते हुए विधायक घनश्याम तिवाड़ी, किरण माहेश्वरी और राव राजेन्द्र सिंह चुनाव हार गए। एक बात और भी है कि गांवों में रोजगार गारण्टी योजना का प्रभाव भी दिखाई पड़ा। भाजपा की कई योजनाएं लागू ही नहीं हो पाई।

किसी की नहीं मानना भी भाजपा के लिए शान की बात हो गई है। चाहे राजनाथ सिंह हो, चाहे आडवाणी, सुषमा स्वराज या वसुन्धरा राजे। इनके लिए तो सही उतना ही है जो इनको सही लगता है। इस पर भी जातिवाद का भूत भीतर इतना उतर गया है कि लोगों को राष्ट्रवाद छोटा सा जान पड़ता है। लोग अपनी-अपनी जाति के बाहर नेतृत्व देने को ही तैयार नहीं है। प्रचार के दौरान भाजपा की छवि गिरती चली गई और किसी के भी कान खड़े नहीं हुए। भ्रष्टाचार और अपराधियों को शरण देने में भी किसी पार्टी से पीछे नहीं रही। आज भी भाजपा अपनी साम्प्रदायिक छवि से उबर नहीं पाई है। नई पीढ़ी का मतदाता शान्ति चाहता है।

राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या हो, इस पर वह सोचे। आज भाजपा से न कार्यकर्ता संतुष्ट है, न ही देश। भाजपा ही देश की दूसरी बड़ी राजनीतिक पार्टी भी है। हर बार इसी तरह मार खानी हो तो इसकी मर्जी, किन्तु कुछ करने लायक बनना है तो पार्टी का पुनर्गठन एवं नीतियों का आकलन करना होगा। सभी पुराने चेहरों को सलाहकार का दर्जा देकर पीछे की सीट पर बिठा देना चाहिए। कांग्रेस में भी ऎसे ही लोग "घुण" का कार्य कर रहे हैं। वहां तो नीचे पोल ही पोल है। भाजपा में तो ऎसा नहीं है। केवल अहंकार है।
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि दो बड़े दलों में से एक पटरी से उतर गया है। वरना तीसरे मोर्चे की जरूरत ही देश को नहीं पड़ती। सब जानते हैं कि तीसरा और चौथा मोर्चा किन लोगों का गठबन्धन है और देश को क्या दे सकता है। भाजपा में यदि आवश्यक सुधार नहीं हुआ तो ये लोग ही लोकतंत्र के नायक होंगे।

मंगलवार, 12 मई 2009

चुनाव में मीडिया की संदिग्ध भूमिका पर नागरिकों का मत

हम नागरिक, लोक सभा चुनाव २००९ के दौरान राजनीतिक पार्टियों एवं चुनाव प्रत्याशियों द्वारा किये गए मीडिया के दुरूपयोग से, बहुत चिंतित हैं. हमें इस बात से भी आपत्ति है कि मीडिया ने अपना दुरूपयोग होने दिया है. यह पाठक के उस मूल विश्वास को तोड़ता है जिसके आधार पर निष्पक्ष एवं संतुलित खबर पढ़ने के लिए पाठक पैसा दे कर समाचार पत्र खरीदता है. मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में माना गया है परन्तु मीडिया के द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की चुनाव के दौरान पत्रकारिता हेतु मार्गनिर्देश (१९९६) के निरंतर होते उल्लंघन ने उसकी लोकतंत्र में सकारात्मक भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

समाचार, विचार और प्रचार के बीच भेद ही नहीं रह गया है. पाठक को यह बताने के लिए कि प्रकाशित सामग्री समाचार, विचार या चुनाव प्रचार है, छोटे अक्षरों में 'ए.डी.वी.टी' या 'मार्केटिंग मीडिया इनिशिएटिव' छापना पर्याप्त नहीं है. कुछ समाचार पत्र तो यह भी छापने का कष्ट नहीं उठाते हैं.

मोटे तौर पर कहा जाए तो खबर से सम्बंधित निर्णय लेने में संपादक की भूमिका पर अब मार्केटिंग वाले सहकर्मी हावी हो रहे हैं. छोटे जिलों या शहर-नगर-कस्बों में तो अक्सर जो व्यक्ति संवाददाता होता है उसी को विज्ञापन इकठ्ठा करने की जिम्मेदारी भी दे दी जाती है, जिसके फलस्वरूप वो विज्ञापन-दाताओं की खबर को महत्व देता है और अक्सर विज्ञापन न देने वाले लोगों की खबर को नज़रंदाज़ कर देता है.

विज्ञापन, 'विज्ञापन-जैसे-संपादकीय', 'मार्केटिंग मीडियाइनिशिएटिव' और अन्य ऐसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीकों से जो खबर मीडिया में आती है, उसपर हुआ व्यय, अक्सर चुनाव आयोग द्वारा तय की गई २५ लाख रूपये के अधिकतम चुनाव खर्च सीमा से, अधिक होता है. इसलिए मीडिया अब इन प्रत्याशियों की मिलीभगत से चुनाव के दौरान लागू आचार संहिता का उलंघन कर रही है.

मीडिया में छप रहे विज्ञापनों, विज्ञापन-जैसी-ख़बरों आदि पर हुए पूरे व्यय निर्वाचन अधिकारीयों को नहीं दिए जाते हैं. मीडिया को यह रपट देनी चाहिए जिससे यह पता चल सके कि किस राजनीतिक पार्टी ने और किस चुनाव प्रत्याशी ने मीडिया पर कितना व्यय किया है. 

राजनीतिक पार्टियों के संचालन हेतु कोई भी कानून नहीं है, ऐसा कानून बनना चाहिए। चुनाव में अधिकतम खर्च-सीमा के उलंघन की सज़ा भी अधिक सख्त होनी चाहिए और मौजूदा चुनाव में ही लागू होनी चाहिए. वर्त्तमान में चुनाव में अधिकतम-खर्च सीमा के उलंघन की सज़ा सिर्फ़ अगले चुनाव में ही लागू होती है, जो पर्याप्त अंकुश नहीं है.

इलेक्ट्रोनिक मीडिया (टीवी) के लिए भी प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया जैसी नियामक संस्था होनी चाहिए।

समाचार पत्रों को 'ओम्बुड्समैन' या विश्वसनीय लोकपाल नियुक्त करने के लिए देश-भर में उठ रही मांग का हम समर्थन करते हैं।

मूल रूप से हम नागरिक यह चाहते है कि मीडिया लोकतंत्र में निगरानी करने वाली निष्पक्ष भूमिका को पुन: ग्रहण करे. आर्थिक स्वार्थ के लिए मीडिया को अपनी स्वायत्ता को दाव पर नहीं लगानी चाहिए. जब लोगों का लोकतान्त्रिक संस्थाओं में विश्वास उठ रहा हो, तो मीडिया को इस पतन में शामिल होने के बजाय, लोकतंत्र में नागरिकों के विश्वास को पुनर्स्थापित करना चाहिए.

सोमवार, 11 मई 2009

कैसे लौटे काली कमाई


दिल्ली में बनने वाली नई केन्द्रीय सरकार के समक्ष एक चुनौती यह भी होगी कि स्विट्जरलैंड जैसे देशों की बैंकों में जमा भारतीयों की काली कमाई को कैसे वापस स्वदेश लाया जाए। यह किसी से छिपा नहीं है कि स्वतंत्रता के बाद से ही विश्व के 70 देशों की बैंकों में भारत का कालाधन जमा होता रहा है। समय-समय पर इसके अनुमान तो लगाए जाते हैं, लेकिन उनके सही होने को कोई प्रमाणित नहीं कर सकता। पिछले साल अखबारों में स्विस बैंकर्स एसोसिएशन की 2006 की वार्षिक रिपोर्ट के हवाले से छपा था कि स्विस बैंकों में भारत के नागरिकों के 1.45 खरब अमरीकी डालर जमा हैं। यह रकम किसी अन्य देश के नागरिकों की रकम की तुलना में बहुत ज्यादा है। दरअसल विश्लेषकों ने हिसाब लगाया कि शेष सभी देशों के नागरिकों की वहां कुल जमा रकम से भी यह अधिक है।

अर्थशाçस्त्रयों का मत है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहले चार दशकों में तो आयकर की दरें बहुत अधिक थीं और कर वसूली ढांचा कमजोर, इसलिए कर चोरी की संस्कृति विकसित हुई। आयात पर बेतहाशा करों के कारण तस्करी खूब होती थी, जिससे समानांतर काली अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। सरकार के सभी विभागों में भ्रष्टाचार का स्तर बेहद बढ़ने और कर चोरों के लिए स्वर्ग माने जाने वाले देशों में बैंकों से गोपनीयता के नाम पर सुरक्षा मिलने के कारण उनमें भारतीयों द्वारा कालाधन जमा कराने का सिलसिला शुरू हुआ। जैन हवाला कांड में बरामद मोटी रकम और दस्तावेजों से बढ़ते हवाला कारोबार का खुलासा हुआ था। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और कर की दरें घटने के बाद पिछली सदी के आखिरी दशक में उम्मीद बंधी थी कि कर चोरी और भारत से बाहर कालाधन भेजने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी। लगता है कि यह उम्मीद पूरी नहीं हुई है। हालांकि करदाता और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों से मिलने वाली रकम में कई गुना बढ़ोतरी हुई है, लेकिन स्पष्ट है कि इस दिशा में अभी बहुत कुछ करने की जरू रत है। विदेशी मुद्रा विनिमय कानून के उल्लंघनों का पता लगाने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) पहले ही बना हुआ है। 

खेद की बात है कि इसका रिकार्ड और उपलब्धियां बहुत खराब रही हैं। यह समय-समय पर विवादों में घिरता रहा है और इसके आला अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझते रहे हैं। इसकी एक बड़ी कमी यह रही है कि इसका प्रमुख कोई आई.ए.एस. ही हो सकता है। मैं इसके कई निदेशक अधिकारियों को व्यक्तिगत रू प से जानता हूं। वे नि:संदेह होशियार, समर्पित और ईमानदार अधिकारी रहे हैं, लेकिन वे इस काले धंधे की गहराई तक नहीं पहुंच पाते। दो वर्ष का कार्यकाल किसी विशिष्ट जांच एजेंसी के प्रमुख के लिए बहुत कम होता है। इस काम को कस्टम, आयकर और पुलिस के अधिकारी ज्यादा बेहतर तरीके से अंजाम दे सकते हैं।

प्रवर्तन निदेशालय के जांचकर्ता के लिए विशेषज्ञता और क्षमता का जो स्तर अपेक्षित है, उसे निर्मित नहीं किया जा सकता। इस बुराई पर काबू पाने में भारतीय रिजर्व बैंक, कस्टम्स, सीबीआई और सेबी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। नई सरकार को इसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दर्शानी होगी तथा ईडी को मजबूत और सक्षम बनाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने होंगे, तभी इस मोटी रकम का एक अंश भारत वापस लाने में सफलता मिल पाएगी। विशेषज्ञों की टोली बनाकर इस काम के लिए ठोस योजना बनानी होगी।

राम जेठमलानी, केपीएसगिल, सुभाष कश्यप आदि ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह मामला उठाया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान पुणे के हसन अली खां और उनके सहयोगी कोलकाता के काशीनाथ तापडि़या के मामले का उल्लेख हुआ। वर्ष 2007 में आयकर छापे के दौरान खां के घर से बरामद कम्प्यूटर में स्विट्जरलैंड के यूबीएस बैंक में जमा 70 हजार करोड़ रूपए का ब्यौरा था।

उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने इस तथ्य पर नाराजगी जताई कि खां वगैरह के खिलाफ कालेधन कानून के तहत कार्रवाई क्यों शुरू नहीं की गई। कर चोरी और अवैध तरीकों से जुटाई गई रकम दूसरे देशों के बैंकों में जमा करने का मामला हाल ही जी-20 देशों की बैठक में भी उठा था। सदस्य देशों ने इस प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताते हुए ऎसी गतिविधियों पर अंकुश के लिए संबद्ध देशों पर गोपनीयता नियमों में संशोधन के वास्ते दबाव बनाने का निर्णय किया था। विभिन्न देशों के कानूनों में संशोधन में लम्बा समय लगेगा, इसलिए सक्रिय पहल के जरिए इस समस्या से निपटा जा सकता है। अमरीका के आंतरिक राजस्व विभाग के अधिकारियों की कोशिशों के चलते अमरीका की एक अदालत ने यूबीएस बैंक पर 78 करोड़ डालर का जुर्माना ठोका है। बैंक जुर्माना देने के साथ ही अपने 47 हजार अमरीकी खातेदारों के नाम बताने को राजी हो गया है। इसके लिए उसने कुछ मोहलत मांगी है। आयरलैंड ने भी जर्मनी की बैंकों से 60 लाख डालर वसूले हैं। यह काम दुष्कर जरू र है लेकिन किसी व्यक्ति की असली परीक्षा तभी होती है जब उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यही बात राष्ट्रों पर भी लागू होती है। यह वक्त ही बताएगा कि क्या नई सरकार अपने इरादे और क्षमता दिखाकर कुछ करती है या इसे भी रोजमर्रा की समस्याओं की तरह मानती है। कई अहम मसलों पर भूतकाल में पूरे मनोयोग से कदम नहीं उठाए गए। उच्चतम न्यायालय में भी इस मामले पर सुनवाई होनी है। हाल के दिनों में देश से जुड़े ऎसे ही महत्वपूर्ण मुद्दों पर अदालत कदम उठा चुकी है। देखते हैं कि इस मामले में वह क्या करती है।

चुनावी चौसर पर रक्तपात


यह घोर विडम्बना है कि राजनीति में नैतिकता के मन्त्र-द्रष्टा महात्मा गांधी के इस देश में बाहुबलियों एवं अपराधियों का जोर बढ रहा है। लोक दिखावे के लिए राजनीति के अपराधीकरण की सभी पार्टियां निन्दा कर चुकी हैं, परन्तु हाथी के दांत खाने और दिखाने के और। नैतिकता की दुहाई देने वाली राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में अपराधी गिरोहों का सहयोग लेने में कोई हिचक महसूस नहीं हो रही है। लोकसभा चुनावों में इस बार भी नामी-गिरामी गैंगस्टरों, हिस्ट्रीशीटरों, माफिया डॉनों की भरमार रही। अब तो राजस्थान जैसे शांत प्रदेश में भी खुलकर गोलियां चलीं तथा हथियारों और बाहुबल का जमकर उपयोग और प्रदर्शन हुआ।
आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों की तीन श्रेणियां हैं- वे जो सजायाफ्ता हैं, वे जिनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल हैं और वे जो आरोपी हैं। कई सजायाफ्ता या आरोपी नेताओं ने इस बार अपनी बीवियों को पार्टियों के टिकट दिला दिए हैं। बिहार इसमें अग्रणी है। वहां बाहुबलियों का बोलबाला है और घोटालों का घटाटोप है। राजद सुप्रीमो लालू स्वयं 950 करोड के चारा घोटाले में फंसे हैं। इसी दल के निवर्तमान सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन सजायाफ्ता होने की वजह से सीवान से चुनाव नहीं लड पाए, तो उन्होंने बेगम हिना शहाब को राजद का टिकट दिलवा दिया। राजद सांसद एवं हत्या के आरोप में वर्षो से जेल में बंद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव फिलहाल जमानत पर रिहा हैं। चुनाव लडने की उन्हें इजाजत नहीं मिली, तो उनकी पत्नी रंजीत रंजन अब कांग्रेस टिकट पर सुपौल से चुनाव मैदान में उतर गई। माफिया डॉन सूरजभान भी चुनावी जंग में उतरने के लिए पूरी तरह से तैयार थे, परन्तु हाईकोर्ट से इजाजत न मिलने पर उन्होंने अपनी पत्नी को लोजपा का टिकट दिलवा दिया। उत्तर प्रदेश भी माफिया डॉनों के लिए कुख्यात है। चौदहवीं लोकसभा में उत्तर प्रदेश के 80 सांसदों में से 23 के खिलाफ आपराधिक मामले लम्बित थे। इस बार भी 30 से अधिक "माफिया डॉन" चुनावी अखाडे में उतरे। समाजवादी पार्टी को गुण्डों का दल कहने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश में आपराधिक छवि वाले नेताओं को जमकर टिकट बांटे। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति सम्बन्धी याचिका उच्चतम न्यायालय में लम्बित है। इसमें उनके पुत्रों- अखिलेश यादव (सांसद) व प्रतीक यादव को भी पक्षकार बनाया गया है। सपा ने भी बाहुबलियों को टिकट से नवाजा है, जिनमें गोंडा से बृजभूषण सिंह, फतेहपुर से राकेश सचान, फैजाबाद से मित्रसेन यादव, धारहारा से ओ.पी. गुप्ता, मिर्जापुर से ददुआ डकैत का भाई बालकुमार प्रमुख हैं।
चुनाव में बाहुबलियों के दखल और धनबल के प्रभाव में नजर आ रही वृद्धि भी केवल "टिप ऑफ द आइसबर्ग" है। स्पष्ट है कि पहले राजनीतिज्ञ बाहुबलियों से धन और बल की मदद लेते थे और बदले में उन्हें संरक्षण देते थे। जब बाहुबलियों ने देखा कि राजनेता उनकी मदद से ही विधायक या सांसद बन रहे हैं तो उन्होंने सोचा कि क्यों न वे स्वयं ही धन और बाहुबल के माध्यम से सीधे चुने जाएं। इसलिए राजनीति की अपराधीकरण के शैशवकाल में जो अपराधी अपने बचाव के लिए राजनीतिज्ञ का दामन थामता था, उसने आज चुनाव प्रक्रिया के द्वारा स्वयं राजमुकुट धारण कर लिया है। आज भ्रष्ट राजनीतिज्ञ, धनलोलुप उद्योगपति, रिश्वतखोर राज्य कर्मचारी एवं माफिया डॉन का गठजोड बन गया है, जो समाज को लील रहा है। एन.एन. वोरा ने अपनी खोजपूर्ण रिपोर्ट में राजनीति के अपराधीकरण एवं अपराधीजगत के राजनीतिकरण का सांगोपांग विवेचन करते हुए लिखा था कि इस गठजोड ने एक "समानान्तर सरकार" स्थापित कर ली है, जो न्याय-व्यवस्था एवं राष्ट्र की सुरक्षा के लिए घातक है, परन्तु आज तो "माफिया" सरकार को ही "हाईजैक" करना चाहता है।
आज राजनीतिक दलों के टिकट बांटने का पैमाना बदल चुका है। बाहुबली, धन कुबेरों, कबीलाई सरदारों को बिन मांगे टिकट मिलने लगा है। जब ऎसे लोग चुनकर आएंगे तो संसद में क्या होगा।

शुक्रवार, 8 मई 2009

संसदीय प्रणाली कितनी सफल


इंग्लैण्ड में अभी तक अलिखित संविधान के कारण परम्पराओं पर वहां का प्रशासन चल रहा है। उसके विपरीत भारत में बहुत विचार-विमर्श के बाद विधान निर्मात्री सभा ने लिखित संविधान का निर्माण किया। उनसठ वर्ष पहले हमने संसदीय प्रणाली को स्वीकार किया था। अब समय आ गया है कि हम इस प्रणाली के परिणामों पर गंभीरता से विचार करें और तय करें कि क्या भारतीय जनतंत्र को मजबूत करने वाली और भी कोई प्रणाली देश में लागू की जा सकती है। ब्रिटेन में इस प्रणाली की सफलता का बहुत बडा कारण है कि वह छोटा सा देश है, जिसमें भारत जैसी समस्याएं नहीं हैं। अपने देश में अनेक भाषाएं, अनेक पंथ, अनेक जातियां हैं। पर्वतीय प्रदेशों में सर्दी, देश के उत्तर-दक्षिणी हिस्सों में गर्मी और पूर्वोत्तर प्रदेशों में वर्षा होती एक साथ देखी जा सकती है। इसलिए भारत में इस प्रणाली का सबसे बुरा असर देश की राजनीति पर हुआ, जो दिन-प्रतिदिन ह्रासोन्मुख है। प्रजातंत्र को कमजोर करने वाली प्रवृत्तियों ने राजनीतिक हलकों में घर कर लिया है। राजनीतिक पार्टियों में प्रजातंत्र समाप्त होकर तानाशाही प्रवृत्ति बढ रही है। पार्टियों पर एक या एक से अधिक व्यक्ति का अधिकार होता जा रहा है। प्रजातांत्रिक तरीकों के बजाय पार्टी के नेता मनमाने ढंग से नियुक्तियां करते हैं। पार्टियों में चुनाव होते ही नहीं हैं। यदि दिखावे के लिए होते भी हैं तो आंतरिक चुनावों का केवल ढोंग किया जाता है। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्रियों का भी चुनाव नहीं होता, उनकी नियुक्तियां पार्टी के एकछत्र नेता की इच्छानुसार होती है। राजनीतिक पार्टियां अपनी ही पार्टी के विधान का पालन नहीं करती हैं।
चुनावों में खंडित जनादेश आ रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों की दुर्दशा हो रही है। व्यक्तिवाद व परिवारवाद पनपने के साथ ही राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है। जातिवाद पनपाने में सभी राजनीतिक दल लगे हैं, जिससे प्रजातंत्र के बजाय भीडतंत्र उभर रहा है। खंडित जनादेशों के कारण केंद्र में भी अस्थिर सरकारें बन-बिगड रही हैं। आम मतदाताओं की समस्याओं का समाधान नहीं होने से उनका प्रजातंत्र से मोह भंग हो रहा है। इस कारण मतदान का प्रतिशत घटता जा रहा है। अस्थिर सरकारें विकास के कार्य पूरे नहीं करवा सकतीं, इसलिए देश में विकास धीमी गति से हो रहा है। देश में राष्ट्रीय भावना व देशभक्ति की भावनाओं के बजाय क्षेत्रीय व जातिवादी भावनाओं का जोर बढ रहा है। 
दूसरी ओर अमरीका को 4 जुलाई 1775 को ब्रिटिश साम्राज्य से छुटकारा मिला। वहां सभी यूरोपीय देशों के प्रवासी रहते हैं, जिनकी अपनी-अपनी भाषाएं हैं। अमरीका के संविधान के निर्माण में 10 वर्ष लगे और संविधान 1787 में लागू हुआ। अमरीका के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी जार्ज वाशिंगटन ने ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली को अमरीका जैसे बडे देश में अनुपयुक्त बताया तथा अध्यक्षीय प्रणाली की वकालत की। उनका तर्क था कि ब्रिटेन एक छोटा देश है, वहां संसदीय प्रणाली सफल हो सकती है, परन्तु अमरीका जैसे बडे देश में संसदीय प्रणाली सफल नहीं हो सकती, अमरीका में अब तक 41 राष्ट्रपति हुए हैं, उनमें केवल एक राष्ट्रपति निक्सन को त्यागपत्र देना पडा था। शेष सभी राष्ट्रपतियों ने अपना कार्यकाल पूरा किया। इस कारण विकास की गति में अवरोध उत्पन्न नहीं हुआ और अमरीका एक विकसित देश बना। इतना ही नहीं विभिन्न यूरोपीय देशों के प्रवासियों व अमरीका के मूल निवासियों में मजबूत राष्ट्रीय भावना पनपी, जिसके कारण देश मजबूत हुआ।
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि संसदीय प्रणाली को स्वीकार करने पर भी भारत ने उतनी प्रगति नहीं की जितनी की आवश्यकता है। इस प्रणाली के कारण देश प्रगति के बजाय या तो स्थिर है या अधोगति की ओर जा रहा है। इसलिए समय आ गया है कि हम इस विषय पर गंभीरता से विचार करें एवं देश की परिस्थितियों के अनुकूल प्रणाली की खोज करें, ताकि देश त्वरित गति से आगे बढे।